जलते बुझते दीप ,काँटे (दो कवितायें)

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1)जलते बुझते दीप!

हे दोस्त!
यहां से वहां तक
नजाने कहाँ तक?
बसे हुए हैं रावण!
हर तरफ हो रहा सीता हरण।
भुखमरी,गरीबी और महँगाई,
कभी कम नहीं होने पायी।
डगमगा रहें हैं जमाने के चरण।
हे दोस्त!
कामनाएं रोने लगीं,
व्यथाएं बोने लगीं।
आदमी जाए तो जाए,
किसके शरण?
हे दोस्त!
प्रशासन इस देश का मन्द है,
ख़ुशी दिल के कटघरे में बन्द है।
कोई नहीं अब स्वछ्न्द है?
टूटे हुए हैं शब्द,
जर्द है आचरण।
बस तम का आवरण,
आवरण ही आवरण।
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2) काँटे!

शून्य में,
खो गयी है हंसी
और वक्त की गहराइयों में,
खो गया है आदमी।
प्यार की पगडंडियों पर,
बिखेर दिए हैं किसी ने काँटे।
सभी मशगूल हैं,
अपने ही आप में,
किसे फुर्सत है?
कि आकर एक दूसरे का दुःख बांटे।

-सुभाषित श्रीवास्तव ‘अकिन्चन’
पिता-श्री शत्रुघ्न लाल(लेखक) कहानीकार।
सम्प्रति-अध्यापन, एम०ए०हिन्दी साहित्य
काव्य सृजन-1983 से अनवरत
गृह जनपद-बहराइच,उ०प्र०, हल्द्वानी।

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