कर रहा क्यों आदमी अभिमान है  (गज़ल)

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कर रहा क्यों आदमी अभिमान है      (गज़ल)

कर रहा क्यूँ आदमी अभिमान है !
जब ठिकाना आखिरी शमशान है !!
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चार दिन की चाँदनी है जब यहाँ !
बन रहा  फ़िर आज क्यूँ शैतान है !!
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आजकल इंसान ही क्यूँ गुम हुआ !
सो गया सा अब लगे भगवान है !!
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फूल सा मन दे रहा है ये सदा !
चूम लेंगे मंजिलों को भान है !!
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चाह धन की है बसी हर एक मन !
हो चला क्यूँ सच से भी अन्जान है !!
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आग में ये नफ़रतों की जल रहा !
प्रीत का तो बस रहा अरमान है !!
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धर्मेन्द्र अरोड़ा “मुसाफ़िर”,कवि ,शिक्षक
9034376051

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