सावन की मनुहार

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सावन की मनुहार

झूम के सावन की ऋतु आई
तपन धरा ने अगन बुझाई।
मेघ गगन में गर्जन लागे
श्याम घटा नभ मण्डल छाई।।

कहीं फुहारें झिरमिर झिरमिर
रिमझिमरिमझिम जल बरसाये ।
घोर घटा अंधियारी बदरिया
उमड़ घुमड़ बिजली चमकाये।।

पंख पसारे मधुबन आँगन
मोर पपीहा नाचे गाये ।
डाली बैठी श्यामल कोयल
मधुर प्यार के गीत सुनाये।।

युगल रूप में भीगा यौवन
बाग बगीचे झूला झूमें।
पेड़ो के झुरमुट में कोई
प्रीत भरा आलिंगन चूमे।।

अलि कलियन का देख नजारा
कवि कागज पर कलम चलाये ।
सावन ऋत के स्वागत में फिर
गीत काव्य गजल बनाये।।

प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”
नाथद्वारा

मगसम द्वारा लालबहादुर शास्त्री सम्मान से सम्मानित संयोजक (13/7/17)

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