माँ by Dr.Purnima Rai

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माँ !

आज माँ
पास नहीं है!
मन को क्यों
विश्वास नहीं है!
छोड़ कर तन्हां
जिंदगी के सफर में
गुजर गये हैं सालोसाल
फिर भी
माँ के अस्तित्व से हीन
मेरे दिल में
कोई अहसास नहीं है!!

जब भी मासूम दिल
घड़ी भरके लिये
लेने लगता है चैन
क्षणभंगुर जीवन के मेले में!!
देती हो माँ !तुम अपनी दस्तक,
मेरी पत्नी की गोद में बैठे
लाल के सिर पर
प्यारा स्पर्श देकर
क्यों मुझे बचपन की लोरी
और झिड़क के सुकून भरे
पलों की याद दिला देती हो माँ!
माँ !बोलो न!
माँ !क्यों बार-बार याद आती हो तुम!!

एक भरा-पूरा परिवार भी है
आस-पास,और
जमघट लगा है स्वार्थी भीड़ का!
उस भीड़ में भी खोजता हूँ
हर पल
तुम्हारे आँचल की छाँव
बदल गया हूँ ,
सुधर भी गया हूँ माँ
अब तो चुप्पी तोड़ो
मुझसे दूर जाने की जिद्द छोड़ो
मेरी खातिर
मृत्यु को विजयी कर लो माँ
माँ !बोलो न!
माँ !क्यों बार-बार याद आती हो तुम!!

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर,15/7/17

drpurnima01.dpr@gmail.com

 

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5 COMMENTS

  1. अद्भुत भावपूर्ण रचना….. बार बार पढूं तो भी एहसास कम नही होने वाले।

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