ओ आतंकी //मत बन आसान (दो कवितायें)

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1) आतंकियों….. कितने को मारोगे

ओ आतंकियों…यही सोच रहे तुम
तुम्हारी गोलियों से
एक दिन खत्म हो जायेगी दुनिया

तुम हमेशा गलत साबित होगे
हौंसले देखो
लोग थके नहीं हैं
डरे नहीं हैं लोग
उनकी निर्भयता ताकत है उनकी
हाँ तुम अलबत अपनी बंदूकों को टांगे
कहीं छिपे होंगे?
तुम्हारा यकीन बंदूकों में है

काठ के दिमाग वालों
तुम्हारे रास्ते आगे बंद हैं|

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2) मत बन जाना इतने आसान

इतने आसान भी मत बन जाना
कि आसानी से समझा जा सके तुम्हें
बिला दिमाग लगाये |

आसान रास्ते
आसान जिंदगी को
हल्के में लेते हैं लोगबाग|
कुछ वलय
कुछ पेंच
कुछ वक्रोति जरूरी है|

सन्तोषकुमार तिवारी
रामगर,नैनीताल

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2 COMMENTS

  1. सामयिक सृजन संग यथार्थ का ज्ञान करवाता सृजन ..संतोष जी बेहतरीन है

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