स्त्री-तारा

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 स्त्री- तारा

रेगिस्तान के ठीक उपर
रात के स्याह आसमान पर
वह एक बड़ा सा नया तारा दिखाई
दे रहा है पश्चिम की तरफ
जिसके इर्द गिर्द
कई तारें जमा हैं
वह तारा एक स्त्री की रूह है
वह स्त्री जो कल ही मरकर
आसमान पर पहुँची है

वह सुना रही है …कोई गीत …धरती का
कोई लोरी है शायद…..जो अपने बच्चों को
सुनाती थी
जिसे वह धरती पर
अपने माँ से सीखी थी
और मरने की रात
तक सुनाकर आई है

या प्रेम की कोई सपनीली ग़ज़ल                              स्त्री- तारा की आँख से झर रहा है
गुलाबी पानी की बूंदे
जो …..धरती पर पहुँच
ठंडी ओस बन जाएगी

उसकी रूह पर
जिस्म के ज़ख़्मों के निशान बाकी है
उसकी साँसों में
शराबी पति की गंध अभी तक है

वह बड़ा सा चाँद देखकर
तलाश करने लगती है
एक चलनी….
और याद करने की कोशिश करने लगती है
करवा-चौथ , तीज के नियम -कथा.

…..मगर … उसके जख्म टिसटिसाते  हैं.
उसे याद आता है
वह अब चहारदीवारी में क़ैद नहीं है
खुले चौरस आसमान पर है
जहाँ ना उसका शराबी पति है
ना गली का कोई मनचला
ना धोखेबाज प्रेमी
ना झूठी सरकारें…..
…..
यहाँ वह ….सचमुच में
मानवी रूह है….बिना
किसी भेद के …..
धरती की तरफ
देखने का भी उसका
मन नहीं होता .

वह अब कोई देह
नहीं पहनना चाहती
ना ….खूबसूरत
ना बदसूरत

अब वह ना मीरा
ना राधा बनना चाहती है
ना सिमोन
ना मारग्रेट
……
वह एक तारा बनकर ही
उन्मुक्त अंधेरे में
खुले आकाश में
चमकना चाहती है

रहना चाहती है….अमर तारा बनकर

गौतम कुमार सागर ,वरिष्ठ प्रबंधक ,बैंक ऑफ बड़ौदा,वडोदरा ( गुजरात) लेखन कार्य :-

 विगत बीस वर्षों से हिन्दी साहित्य में लेखन. दो एकल काव्य संग्रह प्रकाशित . तीन साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित . विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में  रचनाएँ प्रकाशित . अखिल भारतीय स्तर पर ” निबंध , कहानी एवं आलेख  लेखन ” में पुरस्कृत.
 
संपर्क :- 102 , अक्षर पैराडाईज़्
नारायणवाडी रेस्तूरेंट के बगल में
अटलादरा वडोदरा (गुजरात)
 मो— 7574820085
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2 COMMENTS

  1. गौतम सागर जी,आपकी रचना बेहतरीन भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति लगी..हार्दिक बधाई

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