लोक-लाज के डर से बिटिया by Dr.Purnima Rai

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गीतिका
लोक-लाज के डर से बिटिया ,
कभी नहीं घबराना तुम।
सदा गर्व से आगे बढ़ना,
पर्वत से टकराना तुम।।
सेवा करके दीन दुखी की,
नाम कमाना जीवन में;
मायूसी की बात छोड़कर,
खुशियाँ ही बिखराना तुम।।
राह कठिन नारी की जग में,
पग-पग बिखरे हैं काँटें।
शूलों  पर कैसे चलना है ,
ये भी हुनर सिखाना तुम।।
मानव जीवन दुर्लभ मिलता
सारे संत फकीर कहें;
मिले भाग्य से नारी जीवन
दुनिया को बतलाना तुम।।

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।  

drpurnima01.dpr@gmail.com               

 

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