धरा मुस्काए by Dr.Purnima Rai

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प्रकृति सजी  

कोमलांगी नारी सी

मन उजास!!

प्रकृति के कण-कण में सौन्दर्य व्याप्त है।सुबह समय पर उठें तो सूर्य की लालिमा हमारा ध्यान अपनी ओर खींचती है क्योंकि उसमें विशेष सुखद एहसास का आकर्षण है।मन ,आँखें तेज से युक्त हो जाती हैं।चिड़िया की मनमोहित करने वाली चींचीं ,कोयल की सौम्यता से भरी कूहु-कुहू और बत्तख की गुटरगूँ- गुटरगूँ का क्या कहूँ, ऐसी कर्ण प्रिय ध्वनि किसे अच्छी नही लगती ??? तो क्यों न सुबह-सुबह  मधुर स्वर सुनें और दूसरों को भी सुनाएं।अगर कहीं पत्तों पर पड़ी ओस पर नजर चली जाए तो न चाहते हुए भी  खुशी -गमी से आँखें नम हो जाती हैं,और अगर कहीं गुलाब का खिला फूल दिख जाए तो हृदय में कोमल भावनाएं प्रस्फुटित होने लग जाती हैं। हाँ जी,कहीं कोई काँटा चुभ जाए तो दर्द से कराहने की अपेक्षा उस दर्द देने वाले काँटे का भी शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि काँटो से,मुश्किलों से,मुसीबतों से निकल कर ही सफलता की सीढ़ी मिलती है।

धरा मुस्काए
अच्छी भावना से ही
मंजिल पाएं!!

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर
drpurnima01.dpr@gmail.com

 

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2 COMMENTS

  1. सकारात्मक सोच से दुखो का निवारण
    उलझनें भी मिठास रखती हैजलेबी की तरह

    • आभार संगीता जी…जिस प्रकार आज जीवन में प्रतिपल मुश्किलें ,विपदायें अकस्मात आ जाती हैं तब प्रकृति ही कुछ पल सुकून दे जाती है

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