वीर एवं वीरांगनाएं (विशेषांक, जुलाई 2017) – कविता

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१* सुधीर सिंह सुधाकर
राष्ट्रीय संयोजक
मंज़िल ग्रुप साहित्यिक मंच
भारतवर्ष
मो—9868216957, 9953479583
 
        ये कौन लोग हैं
 
ये कौन लोग हैं ?
जो फुटपाथों पर सोते हैं
जिनका न कोई घर है न ठिकाना
न बीबी हैं न बच्चे
न कोई चिंता है न परेशानी
मुंह अंधेरे ही जग जाते हैं
क्योंकि पेट की आग
नहीं सोने देती इन्हें
निगाह रखते हैं
बाबूजी आएंगे
गरम चाय पिलाएंगे
मठरी भी साथ लाएंगे
निगाह तकते हैं
बार-बार लोग झटकेगें
फिर भी लाइन लगाएंगे
दो रोटी के लिए
रात को साथ सोये
किसी को न जानेगें
किसी को न पहचानेंगे
बस पूरी ताकत से भीड़ जाएंगे।
खून मुंह से निकलता है तो निकले
झपट कर रोटी तो मिली
बेचारगी चेहरे पर लिए
फिर लाइन में लग जाएंगे
पेट भरा फिर घोड़े बेच सो जाएंगे।
रात होगी ठंड तो लगेगी
कुछ नशा कर सो जाएंगे।
शरीर ने साथ दिया तो
जिंदा रह फिर लाइन में लग जाएंगे।
नही बचे तो लावारिश बन
सरकारी कागज में अपना
नाम भी न लिखवा पाएंगे।
आखिर ये लोग कौन हैं
कहाँ से चले आते हैं ?
क्यों अपनी बेबसी दिखलाने चले आते हैं।
इन पर फिल्म बनती है
हिट सुपर हिट हो जाती है
पर दो सौ करोड़ का आंकड़ा नहीं छु पाती हैं
जानते हैं क्यों ?
क्योंकि ये वे वो हैं जिनका कोई नही होता
इनका फुटपाथ बिस्तरा
और आसमान घर का छत होता है।
इनके जिंदा रहने पर किसी को कोई
फर्क नहीं पड़ता
इनके जिंदा न रहने पर भी
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
तभी तो इनकी मौत पर
कोई आंसूं बहाने वाला नहीं होता।
इन्हें नहीं मालूम की इनकी
संख्या दिखाकर न जाने कितने मालामाल हो जाते हैं।
पता नहीं क्या लेकर आते हैं?
तकदीर देखिए इनकी सिर्फ और सिर्फ सरकारी कफन पाते हैं।
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२*  रवि कुमार “रवि”
मो. न.:-9031487071
पिता:- श्री सुनील कुमार सिंह
ग्राम+पोस्ट:-बड़हिया
टोला:-इन्द , वार्ड न. :- 07
जिला:-लखीसराय (बिहार)
पिन :-811302
 
    अभिमन्यु कब हारा
खड़े थे रण में वीर सकल ,
व्यूह रचा गहरा था
छल , बल में थे निपुण अरे ,
 साजिशों का पहरा था
बढ़ा किशोर अकेले दम पर,
कदम ना उसका ठहरा था
बोल-बोल सखे मेरे , अभिमन्यु सुभट कब हारा था ?
बढ़ चढ़ कर सूरमाओं ने,
 युद्ध कौशल अपना दिखलाया
एक अकेले वीर छोरे के
पथ में रोड़े अटकाया
निडर सुजान ने खंभ ठोक फिर
शत्रु को ललकारा था
बोल-बोल सखे मेरे ,अभिमन्यु सुभट कब हारा था ?
रणभेरी के नाद से ,
दिशाओं में उत्सव मचा था
शस्त्रों के झंकार पर
नेत्रों में रक्त भूचाल मचा था
उन्मत गज था बना किशोर वो
योद्धाओं को ललकारा था
बोल-बोल सखे मेरे ,अभिमन्यु सुभट कब हारा था ?
वनराज सरीखा चपल निपुण वो
युद्धकौशल में हाहाकारी था
शत्रुदल पर एक अकेला
अभिमन्यु वीर भारी था
शत्रुदल के माथे पर
चिंताओं ने आ घेरा था
युद्ध नियम के अनुबंधों को
कपट युद्ध ने तोड़ा था
बोल बोल सखे मेरे ,अभिमन्यु सुभट कब हारा था ?
शस्त्र विहीन शत्रु के मध्य में
वीर सुजान अब भी खड़ा था
रथ का पहिया हाथ लिए
वीर सुजान अब भी अड़ा था
था खून से लथपथ नव किशोर वो
शत्रु पर फिर टूट पडा था
मृत्यु जो ,थी समीप उसके
अचरज में वो भी पडा था
हुँकार भर फिर भी उसने
शत्रु को ललकारा था
बोल-बोल सखे मेरे अभिमन्यु सुभट कब हारा था ?
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३* रंजना नौटियाल

B-180 DDA flat kalkaji New Delhi -110019
E Mail – nautiyalranjna.75@gmail.com
मो– 8527223888
 
शृंगार बना हथियार
बन के बुत खड़ी रही,नई नवेली वो नार
हाथ की मेहंदी भी न छूटी ,छूट गया शृंगार
करके वादे गया था साजन ,दुल्हन से कई हज़ार
रंग देगा उसका जीवन ,लायेगा नई बहार।।
कर न सका वचन वो पूरे,छोड़ गया मँझधार
किया घात दुश्मन ने छिपकर मारा सरहद पार
आसूँ अपने पोंछ के बोली अब न होगा नरसंहार
अब न धरती लहू रंगेगी न होगा माँ का आँचल तार तार।।
बेटा ही न होगा सैनिक बेटी भी लहू बहायेगी
दुश्मन का सीना छलनी करने वो भी सरहद पर जायेगी
अब न बनूँगी ममता की मूरत अब न मै सावन गाऊँगी
दयाधर्म को घर मे रखकर शंखनाद मै फूँकवाऊँगी।।
बहना न रस्ता देखेगी राखी टीके को भैया का
वो लेगी हाथो मे हथियार दुश्मन दल को सबक़ सिखाने
क़सम अब मैंने खायी है बारूदों गोलों बम से मैंने
प्रीत प्यार की लड़ाई है बदला लूँगी घुसपैठियों से।।
मज़ा उनको सिखाऊँगी करूँगी कूटनीति से हमला
उनकी चाल से ही मै उनको हराऊँगी
अब न होगा कोई मिलाप न ही कोई लाचारी होगी
दुश्मनों से अब सीधी जंग देखना हमारी होगी।।
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 ४* मीनाक्षी सुकुमारन
जन्मतिथि : 18 सितंबर, नई दिल्ली
शिक्षा : एम .ए (हिन्दी) ,एम ए (इंग्लिश)
संपर्क —D – 214 रेल नगर प्लाट न ए – 1 सेक्टर- 50 नॉएडा (यू .पी) 201301
ई-मेल :virgo 67@ymail.com
मोबाइल   : 9810862418
 
   माँ कह एक कहानी
 
कहता अबोध बालक की भांति
घायल मन आज ये
खींच माँ का आँचल
“माँ कह एक कहानी”
“कह बात कुछ भी
पर दे न मुझे उपदेश
शांति का
सीखूँ कैसे पाठ ये तेरा
जब देखूं हर दिशा अशांति ”
“माँ कह एक कहानी ”
“कह बात कुछ भी
पर बहला न मुझे सुना
किस्से गाँधी , नानक , गौतम के ”
“ माँ कह एक कहानी ”
“छेड़ न तार दिल के
कह बार –बार “हूँ”
महान आत्मा जो पाया
जन्म इस धरा पर
है इतना ही महान
माँ देश तेरा
है इतनी ही पूजनीय धरती तेरी
फिर क्यों कर होता
नाच दानवता का गली – गली
क्यों का सिसकता यूँ बचपन है
क्यों कर आहें भारती
नयी नवेली दुल्हने हैं
क्यों कर सिसकता बेसहारा
बुढ़ापा  है ”
“कहती आई तू बचपन से
सच होता बलवान बड़ा
फिर क्यों कर हार जाती
सच्चाई कदम – कदम पर
कहती थी तू होती सदा
जीत  अच्छाई की बुराई  पर
फिर क्यों आज पग –पग पर
आगे निकल जाती बुराई  है
कह तो ज़रा माँ
क्यों छिड़ी हर नगर –डगर
ये खूनी जंग  है
क्यों सोता है देश तेरा
गहरी नींद में
या सुनी नहीं वीर कथाएँ
इन्होंने मुख से अपनी माँ के
क्यों नहीं जानते ये
मोल इस धरा का क्या है
है क्या कारण माँ
बोल ज़रा !!
कैसे कर लूँ यकीं
यूँ बातों पर तेरी
बहला न तू यूँ मुझको
कर बातें बड़ी .बड़ी
कैसे देखूं छवि दिखलाना
चाहें जो बातें तेरी
जब सामने देखूं कुछ
और ही कहानी
सीँचा तूने बचपन से
मन जिन बातों से
होश संभलते ही
बदलने लगी  है रूप अपना
अब तू ही कह  माँ
क्या सच क्या झूठ है इस फेर में
हारी माँ तुझ से मैं
अब कर तकरीरें
छोड़ कर बात कोई और
हो चली रात और गहरी ”
माँ भरी आँखों से
देखती तस्वीर बदले भारत की
पथराई सी खड़ी माँ
सोचे खो गयी राहें कहाँ
सब देश प्रेम की
कैसे  कहूँ इस से
जो कहती है सच वो भी
पर सिखलाया दिखलाया
जो मैंने वह भी झूठ न था
है बदलाव कहीं तो
समय की धारा में
जिसने झूठलाया  ‘कल’
‘आज’ के सामने है …..|
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५* नीरजा मेहता ‘कमलिनी
मूल निवास : लखनऊ (यू. पी.)
वर्तमान निवास : बी-201, सिक्का क्लासिक होम्स,
कौशाम्बी, गाज़ियाबाद (यू. पी.)
मोबाईल/ईमेल — 9871028128, 9654258770
 
       किन्नर
हाँ, मैं हूँ किन्नर
होश संभाला
स्वयं को पाया
किन्नरों के बीच।
नहीं जानता
कैसी होती माँ
कैसा होता पिता
क्या होती ममता,
बड़ा हुआ
तब जाना मैंने
दिया जिसने जन्म
किया उसी ने बेघर।
पहन लेता हूँ
चूड़ी, बिन्दी, गजरा, पायल
ओढ़ लेता हूँ चुनरी
किन्तु खुद की देह देख
समझ नहीं पाता
मैं पुरुष हूँ या स्त्री।
मुस्करा लेता हूँ
पर उस मुस्कान
के पीछे की टीस
क्या समझेगा ज़माना।
समाज से दुत्कारा गया
अकेला पड़ा
तड़पता रहा
तरसता रहा
पर नहीं देखीं किसी ने
मेरी भावनायें।
किसी ने न समझी मेरी व्यथा
मुझे भी है जीने का हक़
मुझे भी मिले सम्मान
मैं भी हूँ इंसान।
मुझे शर्म नहीं कि
मैं कहलाता हूँ किन्नर
सबकी खुशियों का
बन जाता हूँ हिस्सा।
मुझमें समाया है
कुछ पुरुषत्व
कुछ स्त्रीत्व
दोनों का हूँ मिश्रण
मैं हूँ कुछ ख़ास
हाँ, मैं हूँ किन्नर।
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६* अँजना बाजपेई
जगदलपुर (बस्तर ),छत्तीसगढ़..
 
मैं अपनी झाँसी नही दूँगी
छा गया था तम गहन अँधकार था ,
समूचे देश को उजाले का इंतजार था
स्याह रात में दैदीप्यमान सूरज बनकर उभरी थी गुलामी की बेड़िया गलाने शोला बनकर दहकी थी
वह वीरांगना अकेली अँग्रेज हूकूमत पर भारी थी देशभक्ति की आग जलाती अाजादी की चिंगारी थी
महाराजा गंगाधर राव की पत्नी ,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई शक्ति का पुँज , वीरता का पर्याय थी
वह कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली बहुत प्यारी थी ..
शानदार व्यूहरचना में माहिर ,वह युद्ध-कौशल में निपुण थी,
निशानेबाजी तलवारबाजी की विजेता वह हवा से तेज करती घुड़सवारी थी।।
अँग्रेजो की आँखे निस्संतान रानी की झाँसी पर गड़ी थी ,
मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी ,रानी भी अपनी जिद पर अड़ी थी,
गोद लिये दामोदर राव को अँग्रेज हूकूमत वारिस नहीं स्वीकार रही थी
 अपनी झाँसी की खातिर रानी हथेली में प्राण लिये युद्ध की तैयारी कर रही थी ,
देशप्रेम का जज्बा लेकर जन्मी वह वीरागँना नारी थी।
अँग्रेजों को लोहे के चने खिलाने युद्ध में आयी विजयरथ की सवारी थी
 लेफ्टीनेंट वॉकर मुँह छिपाकर भागा,
 अँग्रेजों को दी वो चोट करारी थी
युद्ध का बिगुल बज गया, सोया हुआ देश जाग गया युद्ध भूमि में चमक रही बनकर तलवार दोधारी थी….
सन् 57 की क्राँति में लक्ष्मी बाई ने प्राणों की आहुति डाली थी ,
आज़ादी के लिये गदर यह शुरूआत भारी थी ,प्राणोत्सर्ग करने की देश ने कर ली  तैयारी थी ….
शक्ति का रूप थी वह युद्ध में बनी प्रलयकारी थी भारत की शेरनी माँ दुर्गा की अवतारी थी..
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७* अनीला बत्रा,शिक्षिका,जालंधर
       मेरी सखी
राह में चलते चलते अचानक
मेरी सखी से टकरा गया युवक,
“माफ़ कीजिएगा, मैंने देखा नहीं”
अत्यंत विनम्रता से बोला वह,
पर यह क्या,ज़ोर से आई आवाज़
इससे पहले कि वह संभलता,
सखी ने जड़ा था ज़ोरदार चांटा।
“खूब समझती हूँ तुम जैसों को,
लड़की देखी नहीं कि छेड़ दिया,
हमने भी अब चूड़ियां नहीं पहनी,
दोबारा हिम्मत नहीं करोगे ऐसी।”
आस पास इकठ्ठे हो गए हमदर्द
और पिट गया तथाकथित लफंगा,
मैं अवाक सी खड़ी देख रही थी
मेरी वीरांगना सखी का कारनामा।
सड़क पर घायल पड़ा वह युवक
लगातार कैद हो रहा था कैमरे में,
अश्रुपूरित नेत्रों से देखता भविष्य।
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८* अर्विना गहलोत,गृहिणी
एम.एस. सी, वनस्पति विज्ञान,
 ग्वालियर,वैद्य विशारद
 
        दुर्गावती
(जन्म- 5अक्टूबर सन 1524
मृत्यु   – 24जून  सन 1564    )
आज समर की पुकार है !!
रण भेरी की आवाज है।
 आज युद्ध का आगाज़ है।
 आज दुश्मन के लिए काल है।
  पग पग फैलाया जाल है।
आज समर की पुकार है।
रण भेरी  की आवाज है।
     आज दुश्मन को दी ललकार है।
     हाथ दामिनी सम चमकती तलवार है।
आज युद्ध मेरा कर्म है ।
  आज युद्ध मेरा धर्म है।
आज समर की पुकार है।
रण भेरी की आवाज है।
  आज वीर भी धीर है गम्भीर है।
   आज उतरी ले के शमशीर है।
      आज करती है जब वो वार ।
     लाशें बिछ जाती कई हजार।
 आज समर की पुकार है।
रण भेरी की आवाज है।
आजमहलों की रानी  है।
नाम दुर्गावती भवानी है।
आज उसकी  फुंकार
 शञु से जाए न वो हार।
आज सिंधू सी हे गर्जना।
आज बनी रण में वो चंडिका।
निकाला अपनी कटार
कर लिया खुद पे ही वार।
     आज समर की पुकार है
     रण भेरी की आवाज है।
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९* अर्पणा संत सिंह
जन्म स्थान- जमशेदपुर
शिक्षा – स्नातक  विज्ञान, इंजीनियरिंग इन कम्प्यूटर साइंस, स्नातकोत्तर हिन्दी में
    गूँज उठा बिगुल
अवनि से लेकर अम्बर तक
गूँज उठा बिगुल
उसके विद्रोह की चिंगारी से
दहक उठा अग्नि विप्लव
उस विप्लव की अग्नि ने
सम्पूर्ण भारत को स्वाधीनता संग्राम का हवन कुंड बनाया
आहुति को कितने ही शूरवीर ने तलवार उठाया था
उसके हुंकार के समक्ष
विश्व विजेता को भी हुआ होगा आश्चर्य
उसके शौर्य पराक्रम के आगे
हर कोई ही हारा था
जिसने स्वाभिमान के खातिर
अपना स्व: वारा था
वह परम वीर योद्धा के आगे
कई वीरों ने मस्तक झुकाया था
उन की पूंजी दृढ़ संकल्प था
अधीनता स्वीकार न करने की
वीरता अडिगता के बल पर
योद्धाओं के इतिहास मेंं
 स्वर्णाक्षरों में गौरवमयी अमरगाथा है
न हुई है उन के जैसी कोई वीरांगना
न होगी उन के जैसी कोई वीरांगना
उसके समक्ष तो कई शौर्यवीर भी वीरता से हारे हैं
त्याग तपस्या के बल पर भरा हुंकार उसने
उस शिरोमणि योद्धा के आत्मविश्वास प्रण
सन् सत्तावन के विद्रोह को दमन करने मे
पसीने छूट गए थे अंग्रेजों के भी
पर उनकी स्वाभिमान शौर्य की अमर गाथा सुन
धिक्कार खुद पर आता है
हम वहीं वीरांगना के वंशज है
शत शत नमन करें उस वीरांगना को
श्रद्धांजलि में जागृत करें मातृभक्ति को
पर अपनी कायरता को ,
अपने स्वार्थ ,अवसरवादिता को, कूटनीति को, राजनीति के शब्दों में उलझाया हैं
आज मातृभूमि पर छाया वहीं घना अंधेरा है
चारों ओर से दुश्मनों ने आकर हम को घेरा है
गद्दारो की टोली ने फैलाया है अराजकता का राज
अब तो जागो
अब तो जागो
लक्ष्मी सा दृढ़ निश्चय कर लो
अब न झुकेंगे किसी के आगे
न किसी गद्दार के आगे
न किसी मक्कार के आगे
न किसी मानवाधिकार के आगे
न पाकिस्तान के आगे
न चीन के आगे
न स्वीकार करेंगे किसी की अधीनता!!
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   १०* डॉ. हरिभजन प्रियदर्शी
     प्रवक्ता हिन्दी
राजकिय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (कन्या) मलोट
 जिला मुक्तसर
 
            सैनिक हैं प्रहरी
भारत माँ के वीर सैनिक, पग न पीछे हटाते हैं।
देश की आन बान खातिर,सर्वस्व न्यौछावर करते हैं ।
मातृभूमि की रक्षा हेतु ,सब कुछ अर्पित करते हैं ।
भारत माँ के चरणों में,सर्वस्व समर्पित करते हैं ।
वतन के लिए अपना घर बार उजाड देते हैं ।
बच्चों को अनाथ पत्नी को विधवा बना देते हैं।
 प्रहरी बनकर हम सबको, चैन की नीद सुलाते  हैं ।
दुश्मन जब आँखें दिखाता हैं ,आँखे निकाल लेते हैं ।
उनकी हर आक्रमकता का,डट के जबाब देते हैं ।
दुश्मन की छाती पर भारत का झण्डा लहराते हैं ।
उनके घर को शमशान बनाकर आते हैं ।
वतन खातिर गोली खाकर ,अमर शहीद कहलाते हैं ।
हे युग परिवर्तक !,युग संस्थापक, युग सूत्रधार ।
तुम्हें प्रियदर्शी का युग युग तक,  कोटि कोटि नमस्कार ।
पर अफसोस ——-
 जब इन वीर सैनिकों पर ,सवाल उठाये जाते हैं।
अन्तर्मन  में बिजली सी कौंध जाती है ।
इन गद्दारों को गोली से,क्यों नहीं उडाया जाता है ।
भारत में रहने का हक छीन ,क्यों नहीं देश से निकाला जाता है ।
********************************************
११* शशि देवली
चमेली,गोपेश्वर,उत्तराखंड
मो–9997716536
 
 वीरांगना तीलू रौतेली
वीर थी बलिदानी थी
वीरांगना स्वाभिमानी थी
तीलू रौतेली नाम था
जोशीली थी मर्दानी थी।
पन्द्रह बरस की उम्र थी
जब तलवार उठाई हाथों में
दुश्मनों से लड़ बैठी थी
काट देती थी आघातों में ।
कन्त्यूरों का हमला था
गढ़वाल अधीन हो बैठा था
पिता और भाइयों का भी
रण में अंतकाल हो बैठा था।
जल उठी प्रतिशोध की ज्वाला
तलवार उठा दी हाथों में
घायल सिंहनी बनी थी तीलू
अब थम न सकी थी बातों में।
बिंदुली नाम की घोड़ी थी
रणभूमि में जब दौड़ी थी
शस्त्र और सैनिक साथ में
दो सहेलियों की जोड़ी थी।
खैरागढ़ को मुक्त कराया
उमटागढ़ी पर बोला धावा
सैन्य दल संग बढ़ती गई
और सल्ड महादेव को मुक्त कराया।
शत्रु की पराजय हो चुकी थी
लौट रही थी विश्राम को
पानी पीने को झुकी नदी में
रख नीचे अपनी तलवार को।
पराजित सैनिक ने निहत्था देखा
पीछे से आघात किया
तीलू की तलवार से ही
उस पर एक प्रहार किया ।
दे गई प्राण रणभूमि पर
इतिहास रचा गई बलिदानी
छोटी सी उम्र में बन गई
गढ़वाल की झाँसी की रानी ।
याद रणबाँकुरी की गाथा है
अमर तीलू की कहानी है
शक्तिपुँज वीरांगना की
गाथा सबको सुनानी है।।
*****************************************
१२* मीनाक्षी मेहरा
हिन्दी अध्यापिका
एस एल भवन,अमृतसर।
 
वही वीर है वही धीर है !
 
वीरता जिस को वरे
न अश्क चक्षु से झरे
वह आशना है वतन पे
चमन में खुश्बू भरे
वही वीर है वही धीर है
न हाथ में कोई शमशीर है
मुकद्दर की खिंची खुद लकीर है
वह न किसी शै से डरे
और न अपनी करनी से टरे
वह अरि के पाँव की जंजीर है
हिम्मत की स्वयं तस्वीर है
वही वीर है वही धीर है
हरता वह सबकी पीर.है
आरजू में जिसकी सूरज खिले
साये में उसके बेफ्रिक हर फकीर है
वही वीर है वही धीर है
राष्ट्र की जागीर है
कहता वह खुद को राहगीर है
सबकी मंजिलों में.है वह शामिल
सबकी वह लिखता तकदीर है
 वही वीर है वही धीर है
********************************************
१३* मोनिका शारदा
मोनिका शारदा
हिन्दी अध्यापिका
स्थायी पता-बी ४२७,
न्यु अमृतसर,अमृतसर।
 
     हिन्द की सेना
हम हैं हिन्द के वीर सेनानी,
नहीं बलिवेदी से घबराते,
वक्त पड़े जब दुश्मन को तब
हम नाकों चने चबवाते।।
सीमाओं पर रक्षा करते,
आपदाओं से टकराते,
तन-मन-धन से न्योछावर
हम अपना फ़र्ज़ निभाते,
हिन्दवासियों की रक्षा खातिर,
जान भी कुर्बान कर जाते।।
हम हैं हिन्द के वीर सेनानी
नहीं बलिवेदी से घबराते।।——
देश में लोकतंत्र कायम रह पाए,
दिन-रात अपनी ताकत  लगाते,
नेताओं की रक्षा  खातिर,
मुस्तैद भूमिका भी निभाते,
राष्ट्र की शांति  की खातिर,
होकर शहीद हम प्रण निभाते।।
हम हैं हिन्द के वीर सेनानी,
नहीं बलिवेदी से घबराते।।——
सैंतालीस,पैंसठ ,इकहत्तर के युद्ध,
में हम दुश्मन को मार भगाते,
कारगिल का भी युद्ध जीत कर
हिन्द पताका फहराते,
सर्जिकल स्ट्राइक कर दुश्मन को
उसके घर में, सबक सिखाते।।
हम हैं हिन्द के वीर सेनानी,
नहीं बलिवेदी से घबराते
वक्त पड़े जब दुश्मन को तब
नाकों चने चबवाते।।।—–
*****************************************************
१४* अर्विना गहलोत,गृहिणी
एम.एस. सी, वनस्पति विज्ञान,
 ग्वालियर,वैद्य विशारद
 
 आज करूँ ना श्रृंगार(दुर्गावती)
 
आज करूँ ना श्रृंगार, करूँ शमशीर वार
अकबर के सैनिक हजार ,मेरी एक टुकड़ी पर भार
एक वार ऐसा करूँ  ,दुश्मन कटे हजार
हाथी पे होके सवार  ,मारूँ ऐसी ललकार
मेरी सुनके हुँकार,दुश्मन जाए सरहद पार
फिर न लोटे अगली बार,खाया सीने पे वार
दिया पुत्र को वार ,धरा का चुकाया भार
फिर आऊँँ तो जीतूँँ हर बार ,ऐसी कामना हर बार
डाला गले में हार ,उठालो डोली कहार
थी गोंडवाना की रानी ,अब तो धरा में जानी
करो इसको नमन हजार, कर दिया इसने सब कुछ वार।।
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