वीर एवं वीरांगनाएं (विशेषांक, जुलाई 2017) – गज़ल

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 नारी नारी है अबला कहलाये कयूँ
शक्ति शिव की सी है घबरायें क्यूँ
नारी नारी है अबला कहलायें क्यूँ।
रूप दुर्गा धरे जब वो दानव लडे़,
भीगी बिल्ली सी बन शरमायें क्यूँ।
सृष्टि सृजन करें माँ की ममता धरे,
अपमान से दिल को वो दुखाये क्यूँ
बेटी विदा करे टप टप आँसू झरे,
कारण जग को अपना बतलाये क्यूँ।
सतही सबंध भी जब चुभने लगे,
रिस्ते घावों सा उनकों धोती जाये क्यूँ
रूप रभां धरे जब देव मोहित करे।
अपने हिस्सें का आस्माँ गवाये क्यूँ।
रूप सीता का जब रूप राधा का वो,
भस्मासुर प्रवृति को फिर निभाये क्यूँ।
संगीता पाठक,बड़ौत,सहारनपुर
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       सियासत का बाज़ार
सियासत का बाज़ार गर्म हो रहा है।
चैन मेरे वतन का कहीं खो रहा है।
मजहब, जाति से क्यूं तोलते इन्सान को;
क्यों दानवता का बीज बो रहा है।
सर्वोपरि मातृभूमि होती है जान लो;
जाग जा मानव क्यों नींद में सो रहा है।
दोहरे चरित्र को जीते रहोगे कब तलक
सरज़मीं पे वीरों का गुणगान हो रहा है।
रहेगा नाम अमर उस वीर का सदा ;
वतन के लिए जो सर्वस्व खो रहा है।
कामनी गुप्ता
वर्तमान निवास- सपत्नी राकेश गुप्ता ,हाऊस नंबर 97 ,सैक्टर .-1,नानक नगर, जम्मू तवी,180004
Mobile-9697254490
Kamnigupta18 @gmail.com
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    जिदंगी हर पल सताती ही रही
दर्द की चादर बिछाती ही रही।
जिदंगी हर पल सताती ही रही।
बाबुल की बगिया की नन्ही कली,
महक यादों की चुराती ही रही
कौन क्यारी में खिलेगी परी,
हक माली के निभाती ही रही।
पिया का घर ,बन चली रानी ,
समर्पण पुष्प चढ़ाती ही रही।
वफा के फूलों की खुशबू से रंग,
बेवफाई के काँटो को सुहाती रही।
ममता की माया  में ऐसी घिरी,
थपकी ,मीठी लोरी सुनाती ही रही।
कर्कश शब्द जडे़ बने समझ वाले,
बेबसी के आँसू में बहाती ही रही।
परम्परा की आड़ में छुपे से नाते,
कदम हँस हँस कर निभाती ही रही।
सतही सबंधों के सड़े गले नाते,
बहते रिस्ते घावों सा धोती ही रही।
मैं नारी एक नीर भरी बदली,
काली घटाओं में समाती ही रही।
अपनों की लगाई शमशान की आग,
राख सा खुद को जलाती ही रही।
प्रेम की बगियाँ ,बन पुष्प कन्हैया,
काँटों में बस मुस्कुराती ही रही।
जगतपती हो तुम जग के खिवैया,
दिल की तुम से बतियाती ही रही।
* संगीता पाठक,बड़ौत,सहारनपुर
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इंकलाबी सुरों को सजाने  लगे
बात दिल की हमें वो बताने लगे,
इंकलाबी सुरों को सजाने  लगे।
धर्म बोली अलग खून तो एक है,
आग नफरत की फिर क्यों लगाने लगे।
शेर जैसे लड़े लाल माँ के सभी,
काल बन दुश्मनों को डराने लगे।
बेड़ियों की जकड़ दूर माँ की करो,
देश सोया हुआ वो जगाने लगे।
बाँध सर से कफन जो गए जंग पर,
आज रेनू बहुत याद आने लगे।
रेनू सिंह ,टुंडला ,फिरोजाबाद
ईमेल–renu11289@gmail.com
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        भारत ये मेरा महान हो जाये

         भारत ये मेरा महान हो जाये।
खुशहाल हमारा किसान हो जाये।।

        दे दो जन्म-दिवस पर यही तोहफा;
हर युवक भगत सा जवान हो जाये।।

       पहने सभी आज बासंती चोला;
वीरों पर सबको गुमान हो जाये।।

       देश-प्रेम का सरूर चढ़े इस कदर ;
दिल में भगत का अरमान हो जाये।।

       वीर तेज़ से भरी दिखती “पूर्णिमा”
कण-कण भगत सिंह निशान हो जाये।।

डॉ.पूर्णिमा राय
जन्म-तिथि–28दिसम्बर
योग्यता —   एम .ए , बी.एड, पीएच.डी (हिंदी)
वर्तमान पता–  ग्रीन एवनियू,घुमान रोड , तहसील बाबा बकाला , मेहता चौंक१४३११४,
अमृतसर(पंजाब)

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         आज की ये बेटियाँ
देखो सीढ़ी चढ़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
आँधियों सी बढ़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
कुछ तो हैं वीरांगनाएँ  कुछ डरी सहमी हुयी।
पर सबक सब पढ़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
हौसले भी हैं बुलन्द  इक नई परवाज़ है।
ला सितारे जड़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
जा खड़ीं सरहद पे जाकर ऐ वतन ख़ातिर तेरी।
बनके काली लड़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
 बन हिमालय तन गयीं हैं शस्त्र काँधे पर सजा।
नाम अपने जड़  रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
दुश्मनों के शीश पर चढ़ मौत बन कर नाँचतीं।
देख जौहर मढ़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
देख सजदा कर रहीं माही तेरे परचम तले।
क्या से क्या कुछ गढ़ रहीं हैं आज की ये बेटियाँ।
 डॉ प्रतिभा ‘माही’ इन्सां
संयोजक(मगसम)
पंचकुला/गुरुग्राम मो—-8800117246

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9) मरहठा छंद
 प्रशान्त मिश्रा”मन
शिक्षा-डिप्लोमा एवं बी टेक(इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजिनियरिंग)
राज्य-उत्तर प्रदेश(महराजगंज),पिन कोड- 273155
मो. – 9415337459*
ईमेल – m.prashant11.11@gmail.com
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                   वीरता
सच आजाद  ह्रदय, तन  मन  से थे, भुजा  रही  मजबूत।
ले  कर  आग  छाती, पर खुद  के यह, अपने  वीर सपूत।
लोहा   अंग्रेजों , से  लेकर  वह,   बन   भारत  की  शान।
तोड़ा  गुरूर उस,  शासन  का  यूँ,  टूटा  सब  अभिमान। ||1||
पन्द्रह बरस महज, आयु रही बस, पकड़ गए फिर जेल।
मात पिता सबका, नाम लिया इक, आजाद  हुइ  न बेल।
काकोरी   साथी,  संग   मिल  यही,  जमकर   लूटे  रेल।
कुछ  धैर्य   वीरता ,  साहस   इनके,  बड़े   अनूठे  खेल। ||2||
अन्याय   हुआ  यूँ, न्याय मूर्ति से,  पीठ  पर  खायी बेत।
आरम्भ  यही  था,  आजादी  फिर,  हुए   सभी   सचेत।
थी अंग्रेजों  की , रूह  काँपती,  सुनकर  जिनका नाम।
आजाद, सुखदेव, भगत  सिंह  और, इनके  सारे काम। ||3||
थीं  जब  तक  साँसे,  यह  शेर  लड़े,  मरे  कई अंग्रेज।
पीपल  की  छाया, आखिर गोली, यहीं  मृत्यु की सेज।
ये  दहाड़  तनहा,   अंग्रेजों  को ,  रौंद  दिए  उस  रात।
नाम खुद का किया, अमर  आजाद, इतिहासों में बात। ||4||
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