वीर एवं वीरांगनाएं (विशेषांक, जुलाई 2017) – विचार मंथन

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१*सुनो तिरंगा ताना देता

हम में से बहुत से शिक्षित और अशिक्षित अपने देश की सार्वजनिक सम्पति के प्रति अपने कर्तव्य निभाने में पूरी तरह सोए हुए हैं,और बेईमान ज्यादा हैं।मुझे याद है कि आज से 22 साल पहले अपने कॉलेज के जमाने में हम जब सिनेमाघरों में फ़िल्म देखने जाया करते थे ,तो कुछ लोग कुर्सियों के कवर ब्लेड मारकर फाड़ गए होते थे..बेशक वह सार्वजनिक सम्पति नही होती थी लेकिन बात तो गल्त हुआ करती थी….आज भी मैं ट्रेन से सफर करते हुए इस बात को वैसे ही महसूस कर रहा हूं.. कल रात अपनी सीट के बिजली प्लग के खराब होने के कारण मैंने अपने मोबाइल की बैटरी चार्ज करने के लिए अपने पूरे कोच का भ्रमण किया तो पाया कि 18 में से 16 प्लग तोड़े गए थे या खराब किए गए थे..यह रेलवे का कम और हमारा अधिक कसूर है..पता नही हमे अपने देश की सांझी-सम्पति को नुकसान पहुंचाकर क्या आनंद मिलता है…क्या यह एक मानसिक विक्षिप्तता नही है ?
क्या यह बड़े स्तर का एक छिपा हुआ अपराधी भाव नही है ?क्या यह कार्य वी आई पी या नेता लोग कर रहे है,जिन्हें हम अक्सर कोसते है ?नही ..यह हमारा एक रूप है..बहुत से शिक्षित और अशिक्षित भारतीय लोगो का..जो खुद को आम भारतीय कहते हैं…और बड़े खास तरीके से अपने कर्तव्यों की धज्जियां उड़ाकर खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं।।

२*मैं भी जागूँ,तू भी जाग

कभी किसी गर्म दूध बेचने वालों की बड़ी कड़ाही में गर्म होता हुआ दूध देखा है ?…मलाई की मोटी परत के नीचे दूध उफनता या उबलता नही ..बल्कि धीमी आंच पे गर्म होता रहता है ..दूसरी तरफ वही दूध किसी पतीले में से कुछ देर बाद ही उबलकर बाहर हो जाता है……
दोस्तो ! 2005 के बाद मैंने क्रिकेट देखनी काफी कम कर दी थी…1983 से लेकर 2005 तक मैंने जुनून की हद तक इसे देखा भी,परखा भी और खेला भी…..पिछले 4-5 दिन से सोशल-मीडिया ,टेलीविजन और अखबारों में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की मिट्टी-पलीत की जा रही थी कि… यह टीम फिक्सिंग करके फाइनल तक आई टीम है…हमारे शेर तो पल भर में इसे ढेर कर देंगे.. दूसरी तरफ t.v चैनलों पे बैठे क्रिकेट विशेषज्ञ (हमारे पुराने क्रिकेट खिलाड़ी)पता नही क्या-क्या भारतीय टीम वन्दन कर रहे थे….लेकिन जब कल 180 रन के अंतर की एक बड़ी शिकस्त मिली तो सोशल मीडिया और इन सबकी बोलती बंद हो गई… ताश के पत्तों की तरह बिखरती भारतीय बल्लेबाजी कहीं भी यह बात साबित नही कर पाई कि वह पाकिस्तानी टीम के सामने कहीं टिकती है…
क्या आपको नहीं लगा कि पाकिस्तानी टीम का जुनून पतीले में उबलते हुए दूध जैसा था ,ऐसा दूध जो उबलकर चारो तरफ फैल जाता है और गृहणी को चारों खाने चित्त कर देता है…और भारतीय टीम हलवाई की बड़ी कड़ाही में ,धीमी आंच पे ,मोटी मलाई के नीचे गर्म हो रहे दूध जैसी है.. उस दूध जैसी जो कि मोटी मलाई के नीचे दबकर उबाला नही ले पाता….जंग और खेल दोनो में जुनून चाहिए होता है..हमने खुद अपनी टीम को इतना पलोसा और इतना ऊंचा उठा दिया कि वो उठ ही ना सकी.. मलाई के नीचे गर्म हो रहे दूध की तरह ..दूसरी तरफ लगातार अपमान और इल्ज़ामों से उलझ रही पाकिस्तानी टीम के अंदर इतना वलवला आ गया कि वह पतीले का उफनता हुआ दूध बन गई और हमे चारो खाने चित कर गई…. हमेशा याद रहे कि दुश्मन को परीक्षा,प्रतियोगिता और खेल में कभी कमजोर मत समझिए..वक्त और विधाता कभी अहंकार के साथ खड़े नही होते।

राजकुमार “राज” शिक्षक
सरकारी सीनियर सैकंडरी स्कूल,बलकलाँ, अमृतसर
मो–9592968886

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