वीर एवं वीरांगनाएं (विशेषांक, जुलाई 2017) – लघुकथा

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                  चरित्रहीन
“तो तुम मानती हो उन दोनों लड़कों का कत्ल तुमने किया?”
“हाँ सर।”
“वजह?”
“वजह मैं बता चुकी हूँ सर।”
“पर तुम्हारी मैडिकल रिपोर्ट कहती है कि बलात्कार हुआ ही नही ।”
“तो सर मुझे रूकना चाहिए था बलात्कार होने तक और फिर उनका कत्ल करना चाहिए था। तब बाइज्जत बरी कर देते आप?”
“सर बकवास कर रही है। चरित्रहीन लड़की है ये मैं साबित कर सकता हूँ ।” विपक्ष का वकील चिल्लाया।
“सर बलात्कार हो जाए या होने से रह जाए दोनों ही परिस्थितियों के बाद हमारा समाज विचित्र सी नजरों से उम्र भर लड़की का चरित्र आवलोकन करता है। उस वीभत्स हाथापाई में मेरे हाथ हसिया लग गया और मैंने गरदन काट दी दोनों की और इस बात का मुझे रत्ती भर भी रंज नही। ऐसी किसी भी घटना के बाद हमारे समाज में औरत की कोई इज्जत नही । या दया का पात्र बन जाती है या शोषण का। हाँ कैंडल मार्च जरूर निकलता मेरे पक्ष में अगर बलात्कार के बाद बर्बरता से मुझे मार दिया जाता तो। पर सर मैं ऐसे मरना चाहूँगी निडर और स्वाभिमानी।” मोना ने गर्व से कहा।
“ये गलत सोच है तुम्हारी। कानून से तुम्हें पूरा इंसाफ मिलता।”अबकी बार जज साहब दहाड़े।
मोना ज़ोर से हंसी  “सर स्कूल ड्रेस में थे दोनो । अठारह के तो यकीनन नही थे । बलात्कार कर भी लेते तब भी आपने रिहा कर देने थे। पर समाज को ऐसे जानवरनुमा जवानों की जरूरत नही सो मैंने खुद ही रिहा कर दिए दोनों हमेशा के लिए ।”
जज साहब का सर झुक गया।मोना की एक एक बात से सहमत होते हुए भी कानूनी दायरों में बंधे जज के हाथों ने मन में टीस लिए उसे उम्र कैद की सज़ा लिख दी ।
डॉ.सुषमा गुप्ता
स्थाई पता:  327/सेक्टर 16A, फरीदाबाद , पिन 121002,हरियाणा
ई मेल : suumi@rediffmail.com
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                   मौन सी दीवार
बारह बरस पहले आया ,इस पान की दुकान के किनारे सड़क पर, अब तो यही घर-द्वार है ।
 पान वाले की दया पर कपड़े मिल जाते ,ठंड  जब सिकोड़ देती, कब कम्बल से ढ़क देता, पता ही न चला। बच्चों के पत्थर की मार से शरीर  चोटों से भरा है , एक घाव ठीक नही होता तो नया घाव लग जाता ।काले बाल सफेद हो गये। भिखारी जान लोग कुछ चंद सिक्के उसकी तरफ उछाल जाते ।कुछ लोग बुरा सा मुंह बना दो-चार भद्दी गालियां दे निकल जाते ।
मैं तो मौन में हूँ। न चाहते हुए भी जवाब नहीं दे सकता। कई बार संयम टूटते बचा है । असहनीय पीड़ा, सर्दी , गर्मी ,बरसात ,भूख-प्यास शरीर के घाव मेरा मौन तोड़ पाने में असमर्थ है।
मेरा मकसद पाषाण सा है ।  पूरा होने पर ही मौन छूटेगा ,इंतजार नियति है ।सोच की तंद्रा भंग हुई तो देखा सामने एक दाढ़ीवाला खड़ा है , उसने पलट कर देखा तो धूप में माथे का घाव का निशाना स्पष्ट दिखा ।कुछ दूर एक व्यक्ति खड़ा था, आज उसे अपने वायरलेस की याद आई इसके उपयोग का समय आ गया। सूचना देते ही बिना किसी हलचल के एक जीप आकर रुकी और सादी वर्दी में पुलिस वाले उतरे ।दाढ़ी वाले को गिरफ्तार कर लिया। भिखारी को सैल्यूट मारते देखकर पानवाला दुकान से उतर कर नीचे आया। अब तक भिखारी खड़ा हो चुका था । पान वाला आश्चर्य से आँँखें फाड़कर देखने लगा ।बारह बरस आँखो के सामने  अपाहिज की जिन्दगी बिताने वाला, देश का सच्चा ऑफिसर निकला। आज वो ही नहींं, सारा देश उसकी कर्मठता के आगे नत मस्तक है।
आज मौन टूट गया। पान वाले को गले लगाकर ऑफिसर भरे गले से बोला, सैल्यूट तो तुम्हेंं है , तुम्हारी वजह से आज जीवित रहकर इस कार्य को कर सका हूँ। आज वनवास खत्म  कर घर की ओर चला हूँ। घर भी आज धन्य हो गया।इस विलक्षण क्षण के इंतज़ार में  सभी आनंदित होकर प्रतीक्षारत हैंं।
अर्विना गहलोत,गृहिणी
एम.एस. सी, वनस्पति विज्ञान,
 ग्वालियर
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