वीर एवं वीरांगनाएं (विशेषांक, जुलाई – 2017) – आलेख

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भारत की एक दलित वीरांगना: झलकारी बाई

    भाजपा ने रामनाथ कोविंद को भारत के राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया है | यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि कोविंद जी यूपी में जन्में एक दलित वर्ग के व्यक्ति हैं | वे दलितों में कोरी समुदाय से आते हैं | कोरी समुदाय उ. प्र. में जाटव और पासी के बाद तीसरा सबसे बड़ा दलित समुदाय है | इस समुदाय के कई व्यक्ति दलित होने के बावजूद भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में भी सक्रिय रहे हैं और उन्होंने हँसते हंसते अपने प्राणों की आहुति दी है | ऐसे ही वीरों और वीरांगनाओं में एक नाम झलकारी का भी है |
    झलकारी, या जिन्हें सम्मान पूर्वक झलकारी बाई कहा जाता है, एक बहुत सामान्य से कोरी समाज की   महिला थीं | लेकिन अपनी वीरता और हिम्मत से वे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की अत्यंत प्रिय पात्र बनकर उनकी सेना में महिला शाखा, दुर्गा-दल, में न केवल स्थान पा गईं, बल्कि जल्द ही इस दल की सेनापति भी बनादी गईं | यह केवल एक संयोग ही था कि झलकारी बाई की शक्ल-सूरत भी लक्ष्मी बाई से बेहद मिलती-जुलती थी, और इसी का लाभ उठाकर अंत में वे रानी को बचाने की गरज से उन्हें महल में ही छोड़ कर और इस प्रकार उन्हें भाग जाने का मौक़ा देकर, एक श्वेत घोड़े की पीठ पर सवार होकर सीधे अंग्रेजों की छावनी में घुस गई | अंग्रेजों ने झांसी के महल को पूरी तरह से घेर लिया था और वे कभी भी हमला करके झांसी की रानी को महल से ज़िदा गिरफ्तार कर सकते थे | ऐसे में स्वामी भक्त झलकारी, रानी के वेश में, स्वयं अंग्रेज कमांडर के सामने खड़ी हो गई | केम्प में हलचल मच गई | सभी अवाक थे | समझा यही गया की रानी खुद ही आ गईं हैं |
    झलकारी बाई ऐसी ही निडर, स्वामीभक्त और देश के लिए मर मिटने वाली वीरांगना थीं | उसने सम्पूर्ण नारी जाती के गौरव को प्रज्ज्वलित किया | त्याग और बलिदान की वे प्रतिमूर्ति थीं | दलित वर्ग की एक ऐसी साहसी नारी की तरह वे याद की जाती रहेंगीं जिन्होंने बुंदेलखंड के इतिहास को गौरवान्वित किया और अपनी बुद्धि चातुर्य और वीरता से अंग्रेजों को भी हतप्रभ कर दिया | झलकारी निम्न वर्ग की एक साधारण नारी थी किन्तु उसकी आँखों में व्याप्त क्रान्ति की ज्वाला को रानी लक्ष्मी बाई ने प्रथम मिलन में ही पहचान उसे अपनी अभिन्न सखी बना लिया था |
     झलकारी का झांसी के पास भोजता गाँव में सन १८८० में जन्म हुआ था | झलकारी के बचपन में ही उनकी माता की मृत्यु हो गई थी | माँ की मृत्यु के बाद पिता ने बालिका झलकारी को एक लडके की तरह पाला | उन्हें साहसी और दृढ-प्रतिज्ञ बनाया | उसे घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग सिखाया | एक बार, कहते हैं, जंगल में लकड़ी काटते समय झलकारी की मुठभेड़ एक बाघ से हो गई, फिर भी वह डरी नहीं और इस साहसी महिला ने अपनी कुल्हाड़ी से उस बाघ को मार डाला | ऐसे ही उसने कई और कारनामे भी किए जिससे झलकारी की बहादुरी आस-पास के इलाकों में विख्यात हो गई |
    झलकारी का विवाह पूरन कोरी से हुआ जो रानी लक्ष्मीबाई की सेना में एक सैनिक था | विवाह में झलकारी के सगे-सम्बन्धियों और आस-पड़ोस ने बड़े उत्साह से भाग लिया | विवाह के बाद झलकारी की मुलाक़ात रामी लक्ष्मी बाई से पहली बार गौरी-पूजन के अवसर पर उनके महल में हुई | रानी को पर्व पर सम्मान देने के लिए झलकारी अन्य महिलाओं के साथ किले में उनसे मिली थी | झलकारी को देखकर रानी अवाक रह गईं | दोनों में एक अलौकिक समानता थी | झलकारी के बहादुरी के किस्से रानी पहले ही सुन चुकी थीं, अत: उनहोंने झलकारी को अपनी सेना में भरती करने का निर्णय उसी समय ले लिया | कालान्तर में उसे सेना की महिला टुकड़ी, दुर्गा दल, का सेनापति बना दिया गया | झलकारी ताउम्र अपनी रानी की बफादार और स्वामीनिष्ठ सेवक बनी रहीं | अंत में वह रानी का वेश धरकर अंग्रेजों के कैम्प में एक धवल घोड़े पर सवार होकर घुस गईं ताकि महारानी महल से, जो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा घेर लिया गया था, सुरक्षित निकल सकें महारानी के लिए झलकारी बाई का यह एक अद्वितीय उत्सर्ग था | इलाहाबाद के कवि स्व. सुरेन्द्रनाथ ‘नूतन’  ने अपने काव्य “झलकारी” में इसका एक सटीक वर्णन किया है |
साधन विहीन होने से वह व्याकुल आज खड़ी थी / जैसे जल सूखे सर में लघु मछली एक पडी थी…
इतने में उसके सम्मुख आगया धवल एक घोड़ा / मालिक को आहात लखकर वह अश्व न था घबराया…
घोड़े को लख झलकारी कुछ बिहंसी कुछ मुसकाई / फिर जा अन्दर से रानी के, वह दिए वस्त्र ले आई…
महारानी वह नकली थी पर अभिनय तो करना था / दानवी-बुद्धि गोरों को कुछ थोड़ा सा छलना था …
अंग्रेजों ने ज्यों देखा उस ओर सिंघनी आते / हो मौन चकित से लखते, मन ही मन थे थर्राते…
इतने में घोड़े पर से झलकारी यों चिल्लाई / है कहाँ रोज़ जा उसको बोलो रानी है आई !…
    रोज़ अंग्रेज़ी सेना का कमांडर था | वह झलकारी को महारानी समझ कर उसके सम्मुख नत मस्तक हो गया | बाद में जब उसे पता चला कि उसे धोखा दिया गया है तो भी ऐसे समय में झलकारी का पागलपन देखकर उसे कहना पडा था की अगर एक प्रतिशत भी भारतीय महिलाओं में इतना पागलपन आ जाए जितना इसमे (झलकारी में) है तो हमने इस देश में जो भी पाया है, वह सब हमें गंवाना पड़ जाएगा | ( If one percent of Indian women become so mad as this girl is, we will have to leave  all that we have  in this country .) इससे ज्ञात होता है कि झलकारी के अन्दर त्याग, बलिदान और उत्सर्ग की भावना तथा अटूट राष्ट्रप्रेम भरा पडा था जिसकी तारीफ़ रोज़ जैसा अंग्रेजों का सेनापति भी बिना किए नही रह सका |
    भारत की वीरांगनाओं में झलकारी का नाम हमेशा आदर पूर्वक याद किया जाएगा | वह हमारी लोक कथाओं और लोक गीतों का हिस्सा बन चुका है, जिसे आज भी बुन्देल ख्गंद में सूना जा सकता है | अनेक साहित्यकारों ने भी इसे कलम बद्ध किया है |
    चोखे लाल वर्मा ने झलकारी के जीवन पर एक वृहद् काव्य लिखा है | सुरेन्द्र नाथ नूतन का ज़िक्र हम ऊपर कर ही आय हैं | मैथलीशरण गुप्त ने महारानी लक्ष्मी बाई पर जो काव्य लिखा है उसमे भी झलकारी बाई का सन्दर्भ बहुत सुन्दर ढंग से पंक्ति-बद्ध किया है | भारत सरकार ने झलकारी बाई की याद में २००१ में डाक टिकिट भी जारी किया था |
                       डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
               मो– ९६२१२२२७७८
         १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड
                 इलाहाबाद -२११००१
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3 COMMENTS

  1. विस्तृत ,व्यापक फलक पर बेहतरीन ढंग से झलकारी बाई के जीवन एवं राष्ट्र प्रेम संबंधी विवरण देने हेतु हार्दिक बधाई
    आ.डॉ.सुरेंद्र वर्मा जी….नमन

  2. स्वतंत्रता के ऐतिहासिक में अनेकों भारतीयों के देशप्रेम व वीरता की कहानियाँ हम सुनकर गौरांवित होते हैं । आ. सुरेन्द्र वर्मा जी का आलेख हमें देश की वीरांगना झलकारी बाई से परिचित कराता है । बहुत -बहुत बधाई ।

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