श्रद्धा के फूल

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श्रद्धा के फूल: विनम्र श्रद्धांजलि

एक प्रसिद्ध रचनाकार ,कवि एवं विशेष व्यक्तित्व के स्वामी आ.अशोक अरोरा जी के आकस्मिक निधन (ब्रेन हैमरेज) पर बहुत दुख हुआ।उनके पारिवारिक जनों के शोकाकुल होने के साथ-साथ सारे साहित्यिक सदस्यों ,प्रिय मित्रों ,कवि कवयित्रियों को एक गहन धक्का लगा।फेसबुक पर मुझसे जुड़े अशोक अरोरा जी से कभी कोई विशेष बात चाहे न हुई ,पर काव्य संग्रह विमोचन पर एक झलक जरुर इनको देखा था।फिर भी आपका व्यक्तित्व आपके चाहने वालों के लिये सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा..कवि भूपेन्द्र राघव जी द्वारा रचित रचना के द्वारा आज हम समूह साहित्यिक सदस्यों की ओर से हार्दिक संवेदना प्रकट करते हैं..नमन महानात्मा को…डॉ.पूर्णिमा राय

आज दिल टूट गया … बहुत शानदार लेखक, साधारण व्यक्तित्व के धनी, मेरे दिल अजीज अशोक भैया आज हमारे बीच नहीं रहे (ऋषि अग्रवाल )

हम में कमी रही जो हमारी दुआओंं ने वफ़ा नही कीभैया आपने, Ashok Arora जी ने तो मौका दिया था क्या शिकायत करे किस से करे ..विन्रम श्रद्धान्जलि

दिलो में थे दिलो में रहोगे
आपकी कमी कोई दूर न कर पायेगा
यह क्षति बहुत गलत हमारे जीवन मेंं भर दी हमेशा के लिए समय के कालचक्र ने (पवन अरोरा)

दुखद समाचार (राकेेश गंभीर)

“” कल तक कहते थे जो, ‘बिस्तर से उठा जाता नहीं’,
आज जहां से चले जाने की ताकत बता तो जरा कन्हैया!
हमारे दोस्त ! में भला क्यूँकर – कहाँ से आ गई ????? हमारी कलमकार बिरादरी के इक महान स्तंभ हरदिल अजीज़ श्री Ashok Arora जी का ब्रेन हैमरेज के कारण हुआ आकस्मिक देहांत हम सभी के लिये अपूरणीय क्षति  है…ॐ शांति ॐ

मिथ्या हैं सब रिश्ते नाते
मिथ्या तेरा मेरा रे …
अंश्रुधार का नाम जिंदगी
बस अदृश्य अँधेरा रे …

वो साँसें जो गर्भकाल से
दिल तक आती जाती हैं
वो साँसें जो तंद्रा में भी
पल पल साथ निभाती हैं
वो साँसें जो हृदयगति के
संग संग खेला करती हैं
वो साँसें जो चक्षुपटल पर
स्वप्न धकेला करती हैं
किसे पता है मांटी घट में
कब तक इनका डेरा रे …
मिथ्या ……………………….

इस मांटी का मोह लगाके
कितने बंधन बाँध लिए
घट फूटा और इन आँखों ने
अविरल क्रंदन बाँध लिए
कौन है बोलो वक्त बढ़कर
अगले पल में क्या घट जाए
मांटी के कांधों पर चढ़कर
मांटीघट मरघट जाए
किसे पता है कब तक आँखें
देखें नया सवेरा रे …
मिथ्या ……………………….

लेकिन प्रश्न हजारो दागे
इस अबोध पागल मन ने
क्या कुसूर है उस योवन का
क्या तोड़ा उस बचपन ने
जननी जनक भ्रात फफकते
बड़े लाड़ से पाला था
माँ ने अपना पेट भींचकर
स्वयं निबाला डाला था
ता-जिंदगी तप का प्रतिफल
आह ! आहों का घेरा रे ….
मिथ्या ……………………….

किससे मन की बात कहेगी
ग्रंथिबंधन जो बंध आयी
उसकी तो सारे जीवन की
डांके में लुट गयी कमाई
बिंदी बिछिया महावर लाली
चूड़ी किसके लिए सजेगी
काजल ईंगुर मेहंदी साड़ी
पायल किसके लिए बजेगी
किसकी राह तकेंगी आँखें
क्या प्रतिबिम्ब उकेरा रे …
मिथ्या ……………………….

रचनाकार भूपेन्द्र राघव

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3 COMMENTS

  1. बहुत ही दुखद घटना है ।साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई है।दिवंगत आत्मा को हार्दिक श्रद्धांजलि ।।

  2. अश्रुपूरित श्रद्धांजलि .. सच एक अपूर्णीय क्षति है दादा अशोक अरोरा जी का यू आकस्मिक चले जाना ..

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