जब जनाजा सनम घर से जाने लगा(गज़ल)

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ज़नाज़ा — ग़ज़ल
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जब जनाज़ा सनम घर से जाने लगा।
बनके खुशबू तू मुझमें समाने लगा ।

हो गया आँख से जब तू ओझल प्रिये।
हर घड़ी याद बनकर रुलाने लगा ।

रह गये बुत बने से वहाँ हम खड़े ।
पास आकर ज़माना सताने लगा ।

सूख पथरा गया नीर नैनों का जब ।
बनके भँवरा ये मौसम रिझाने लगा।

खो गयी नींद के जब मैं आगोश में ।
ख़्वाब की तू गली आने जाने लगा ।

रात बोली क्यूँ हमसे ख़फ़ा हो गए ।
बात हर पल नई इक बताने लगा ।

देख अन्धे कुऐ में वो तन्हा मुझे ।
बनके सूरज अँधेरा मिटाने लगा ।

बोला इक बार तक तो ज़रा सामने ।
देख ज़न्नत मैं फिर से सजाने लगा।

चल दिया साथ बनकर वो साया मेरा।
हर नज़र में नया गुल खिलाने लगा।

तू न रोना मेरी जान अब से प्रिये ।
देख खुशियों का मन्ज़र भी छाने लगा।

आ गया आज ‘माही’ बुलाने तुझे ।
अब घरौंदा फ़लक पर बसाने लगा।

डॉ.प्रतिभा ‘माही’ इन्सां
पंचकूला,गुरुग्राम,
संयोजक मगसम

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