मंज़िलों के दीप

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मंज़िलों के दीप

मेरी हिम्मत देखकर जब रास्ते चलने लगे !
मंज़िलों के दीप हर सू खुद-ब-खुद जलने लगे !

हसरतें दिल की जगी सब थी निहां जो अब तलक !
इन निगाहों में शगुफ्ता ख्वाब फ़िर पलने लगे !

गैर मुमकिन ये गज़ल है कह रहे थे लोग जो !
आज़ अपना सर झुकाए हाथ वो मलने लगे !!

शायरी की जब मिरे मन में लगन सी  लग गई !
आँखों आँखों मे हमारे रात दिन ढलने लगे !!

हौंसले की जोत लेकर जब मुसाफ़िर चल दिया!
दौर गर्दिश के सभी फ़िर दूर से टलने लगे !

 


          धर्मेन्दर अरोड़ा “मुसाफ़िर”

पिता का नाम:श्री सोमनाथ अरोड़ा

शिक्षा:B.Com
(Vocational-All Taxes)

जन्मतिथि :9-10-1978

जन्मस्थान:निगाणा
(रोहतक)

सम्प्रति:अध्यापक,कवि,
खिलाड़ी

सम्मान: साहित्य के क्षेत्र में योगदान हेतु विभिन्न मंचों द्वारा कई बार सम्मानित

प्रकाशन: अनेक पत्र पत्रिकाओं,वेबसाइटस एवं अख़बारों में रचनाएं प्रकाशित

संपर्क:मकान न;1539,न्यू हाऊसिंग बोर्ड कालोनी,पानीपत
(हरियाणा):+919034376051

ईमेल: dharmenderarora.
rajyogi@gmail.com

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अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

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