सावन धूम मचा जा (माहिया छंद)

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माहिया (आभा सिंह)


मोर पपीहा बोले
बूँदों की रुनझुन
जियरा डगमग डोले

काली बदरी छाई
कागा सगुन बता
पिय की याद सताई

आजा माही आजा
दिल की गलियों में
सावन धूम मचा जा

                कब लेने तू आये                                       वीरे राह तकूँ                                        सावन बीता जाये                

लिख-लिख भेजी पाती
तू कब जानी माँ
मैं जागी दिन राती

पवन झकोरे छाये
पिय के आने के
सपने झूले गाये

बेला फूले महके
अँखियों के अँगना
सपन सलोने चहके

सावन झरता जाये
बिजली चमक रही
मनभावन कब आये

झूम रही है डाली
भँवरों की गुनगुन
तड़प जगाये आली
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पीर करे मनमानी
सपने कुतर रही
कैसी अब जिंदगानी

आभा सिंह
जन्म- 6नवम्बर 1944
विधा- कहानी, कविता ,लघुकथा
प्रकाशित रचनाएँ – कोने का आकाश, अब तो सुलग गये गुलमोहर , टुकड़ा टुकड़ा इन्द्रधनुष, अस्तित्व का हठ, माटी कहे।
मो-088290-59234
abhasingh1944@gmail.com

 

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