एक पत्र तुम्हारे नाम

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    एक पत्र तुम्हारे नाम

    प्रिय दोस्त ,
    तुम सोच रहे होगें जब हम दिन में दो तीन बार फोन में बातें करते ही है तो मुझे पत्र लिखने की क्या ज़रूरत है पर कई बार जो हमारे मन में होता है उसे हम पत्र के माध्यम से आसानी से दूसरो को बता सकते है फोन पर नहीं।

    जानते हो दोस्त , तुमसे कुछ मुलाकतों के बाद ही ज़ाने क्यों कोई स्पेशल कनेक्शन फील हुआ था उसी समय से एक अजीब सा खिंचाव और लगाव …. एेसा पहले कभी नहीं हुआ …. किसी के भी साथ ….. तुमसे भागने की बहुत कोशिश की मैने …. कितने बहाने बनाये ….. दिल को समझाने के …. पर दिल नहीं माना … तुम किसी फरिश्ते की तरह आये मेरी ज़िन्दगी में …. और उसे बेहद खूबसूरत बना दिया ….. अपने रंगों में रंग के .

    जानते हो दोस्त इतनी बड़ी सी दुनिया और अरबों लोगों के बीच …. दो लोग …. एक दूसरे से बिल्कुल अलग … एक दूसरे से एकदम अनजान … फिर भी एक दूसरे के लिए बेहद अहम खास अनमोल .. कोहिनूर की तरह … नहीं नहीं सांसों की तरह … ज़िसके बिना ज़िया न जाये … एक – दूसरे के बिना अधुरे … निर्जीव …. लाश की तरह … ज़िसमें सांसे न हो , इच्छाएँ न हो , सपने न हो , रास्ते न हो , मंजिल न हो ।

    यूं तो तुम्हें कभी तुम्हारे नाम से नहीं बुलाती हूँ …. पर जानते हो क्यों तुम्हारे नाम से इक लगाव सा है … जब कभी भी तुम्हारा नाम कहीं सुनती या पढ़ती हूँ तो एक पल के लिए एेसा लगता है मानो तुम करीब हो …. कहीं आस पास ही … उस नाम में बसे हुए … जैसे ये ही नाम परफेक्ट है . तुम्हारे लिए जैसे उस ऊपरवाले ने मेरी दुआअों भरी चिठ्ठियों के जवाब में ही लिखा हो यो नाम … तुम्हारा नाम …. उसके आशीर्वाद जैसा पर जानते हो जब तुम मेरे नाम जब पुकारते हो तो मानो मेरे नाम को सही अर्थ और सार्थकता मिल गई हो …..

    तुमसे हर दिन शाम में बाते करना …. सारे दिन की उथल – पुथल … मन के सारे अजीब अो गरीब ख्याल … दुविधाएं …. दु:ख व्याकुलता …. खुशियों के छोटे छोटे लम्हे …. सब कुछ तुम्हे बता के , तुम्हे सौप के …. खुद रिलेक्स हो जाना …. मेरे मन को नई ऊर्जा से भर देने वाला … तुमसे बातें करना एेसे है जैसे रेगिस्तान में ठंडे पानी का मिलना … चिलचिलाती धूप में बरगद की विशाल छाया मिल ज़ाने …. मन को शांत कर देने वाला भजन … आत्मा को तृप्त कर देने जैसा ….

    जानते हो दोस्त मुझे तुममें क्या पसंद है तुम्हारी मुस्कुराहट , हंसी , आवाज, तुम्हारा परदर्शी दिल ज़िसमें सभी के लिए प्यार हमदर्दी और इंसानियत है …. चाहे वह गरीब बच्चे हो या अनाथ बच्चे हो … चाहे वह वृद्ध हो या बीमार …. समाज में औरतों की स्थित हो …. देश के प्रति समर्पण हो …. तुम्हारी आत्मा कितनी पवित्र है … इस धरती पर कहां इतनी पवित्र आत्मा होगी …. अरे य़ार तुम मुझे देवता लगते हो … बस इससे ज्यादा किसी की तारीफ नहीं हो सकती।

    मैं ज़िन्दगी भर का साथ तुमसे चाहती हूँ …. मैं बूढ़ी होना चाहती हूँ
    तुम्हारे साथ … तुम्हे देखते हुए … महसूस करते हुए … तुमसे झगड़ते हुए …. बाते करते हुए …. तुम्हे प्यार करते हुए …. बेशुमार प्यार करते हुए …. मैं तुम्हारे साथ एक छोटा सा घर बनाना चाहती हूँ …. किसी पहाड़ी गांव में …. जहां हम दोनो बुडे बुढ़िया मिल कर रोजमर्र के काम करेगे … बगीचे में सब्जियां और फल लगायेगे … फिर खाना बनायेंगे , चिडियों को दाना खिलायेंगे .. छोटे छोटे गरीब बच्चो को पढायेंगे … अनाथ बच्चो की देखभाल करेगे … नेचर की सुन्दरता निहारेंगे और सारा दिन मैं अपनी नांन स्टाप नानसेन्स बातों से बोर किया करूँगी … हंसों मत मेरे सपनो पर .
    तुम्हारी अर्पणा

    अर्पणा संत सिंह,जमशेदपुर

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    3 COMMENTS

    1. मैं हमेशा कहती हूँ कि लेखक वो लिखे जो हर पाठक को पढ़ने के बाद ऐसा लगे कि अरे यार ! ये तो मेरे मन की भावनाएं हैं । अपर्णा जी आप ने जो लिखा वो बिल्कुल मेरे मित्र के बारे में लिखा है । हू ब हू । ऐसे ही मेरी भावनाओं को शब्द देती रहें। साधुवाद!

    2. एक पत्र तुम्हारे नाम , अर्पणा जी का खूबसूरत पत्र है ।
      भाषाशैली हमारी आपसी बातचीत जैसी है ।जिसमें हम आपस में दिल की बात कहते हैं । इसमें निकटता व अपनेपन का खूबसूरत अहसास है । बधाई अपर्णा जी ।

    3. बहुत ही सुन्दर और प्रभावशाली पत्र, दिल की बातों का इतनी खूबसूरती से बयां किया आपने की हर एक एक दिल को छु जायेगी।

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