नगर में उत्सव :एक व्यंग्य

0
126

नगर में उत्सव :एक व्यंग्य

( भूपेंद्र राघव)

नगर में उत्सव
उत्साह में सब
सब में
हम तुम और वो
जो
रहते हैं कोठियों में
चलते हैं कारों में
छपते हैं अखबारों में
उस रोज
प्रीति भोज
बड़ा सा पंडाल
व्यंजनों से मालामाल
सुबह से शाम
खीर पूरी कालेजाम
और मोटे होते मोटे पेट
लार टपकाती आँखें
दोने चम्मच कटोरी प्लेट
और उधर
पंडाल से खाकर दुत्कार
तीन दुधमुँहे बच्चे
दूर कौने में खडी लाचार
काया लकड़ी की तरह सूखी
आखों में उम्मीद,आँतों से भूखी
उखड़ता हुआ पंडाल
बिखरती हुई उम्मीदे
रात का अँधेरा पत्तलों का ढेर
कुरेदते नन्हे हाथ …
गिरते आंसू,
माँ की आस..लंबी साँस..
मूक शब्द .. हाय प्रारब्ध…
कछु नाय मिलैगो रे…
नन्ही उंगलियां…
भीगते पोर.. चिपकती फलियां
कुछ टूक…निकलती हूक…
और ” अवई कछु ख़तम नाय भयो है ”
कछु है अम्मा मिल गयो देख..
लै नैक खाय लै..
लौटते कदम.. ढूंढती निगाहें
एक और ढेर…
अगली सुबह अखबार
प्रथम पृष्ठ पर
नगर में विशाल भंडारा..
और अंतिम पृष्ठ …
छोटा सा कौना …
माँ ने तीन बच्चों के साथ
खुद को पेट भींच कर मारा …
अब..आज…फिर
नगर में उत्सव …
अभी सब ख़त्म नही हुआ है…
॥ भूपेन्द्र राघव ॥
Loading...
SHARE
Previous articleप्रेम गीत लिख ही नहीं पाती हूँ
Next articleआओ फ़िर जिंदा होते हैं
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here