हर समय कहाँ घर में रोटियां निकलती हैं।

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हर समय कहाँ घर में रोटियां निकलती हैं।


       ( शोभित तिवारी”शोभित”)

रोज़ रोज़ चीख़ों की सुर्ख़ियां निकलती हैं
इसलिए घरों से कम बेटियां निकलती हैं।

जिनको जिस्म ढकने को चादरें नहीं मिलतीं.
सोचो कैसे उनकी फिर सर्दियाँ निकलती हैं।

लोरियां सुनाकर अब काम चलाती है माँ
हर समय कहाँ घर में रोटियां निकलती हैं।

इसलिए कभी भारत बढ़ सका नहीं आगे।
बस यहाँ ‘पे’ कुछ ज्यादा रैलियां निकलती हैं।

दौड़ना पड़ेगा ही हमको अपने पाँवों से।
हर किसी की ख़ातिर कब टोलियां निकलती हैं।।

आपके आगे हमेशा चुप रहते हैं लोग यहाँ।
पीठ पीछे’ ही लाखों खामियां निकलती हैं।

प्यार से कोई दुश्मन मानता न घाटी में।
तब यहाँ बंदूकों से गोलियाँ निकलती हैं।

शायरी गजल इसके नाम पर नहीं कुछ भी।
उसके मुंह से तो केवल गालियां निकलती हैं।

बढ़ रही हैं सड़कों पर लूटपाट अब शोभित
आबरू बचाकर अब गाड़ियां निकलती हैं।

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