बेवफाई के जमाने में वफा ढूँढते हैंby Dr.Purnima Rai

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 बेवफाई के जमाने में वफा ढूँढते हैं।

Dr.Purnima Rai,Asr 

बेवफाई के जमाने में वफा ढूँढते हैं।
बेजुबानों के शहर में क्यों खुदा ढूँढते हैं।।

बेवफाई!!
एक दिन मिली
चौंक में!!
थोड़ी सी सकुचाई,थोड़ी सी लजाई
खा रही थी मिठाई!!
तोड़कर जज़्बात भरे दिल को
खरीद रही थी फैवीकॉल
लेते हुये अंगड़ाई!!

बेवफाई!!
तो जनाब
है बड़ी हरजाई
न पूछो कितनी
भरी हुई ,इसमें चतुराई!!
ऋतुओं के जैसे
बदलती परिधान
है बड़ी मुँहज़ोर
नकाब पहन कर नहीं
आमने-सामने ही
करती है अब लड़ाई
जिसकी कभी न होती
फिर भरपाई!!

बेवफाई!!
उद्घाटित करे सच्चाई
प्रेम की वास्तविकता
से है कोसों दूर
महज छल-कपट के बल पर
पेश करती
संबंधों की घिनौनी तस्वीर
जिसमें दिखता है अक्स खुद का
और हो जाती है
फिर मन दर्पण की सफाई!!

बेवफाई !!
है एक बुराई
रुस्वा होकर भलाई में
जो छीन लेती सारी खुदाई
कवि की कविताई
खलनायक ,खलनायिका
उपन्यास की कुपात्रा तो
कभी सुपात्र बनकर
खिलखिलाई,बेशक
होती रहे जग हँसाई!!
डॉ.पूर्णिमा राय,
अमृतसर(पंजाब)
drpurnima01.dpr@gmail.com

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