पिता का साया

1
216

*पिता का साया*

कितना पाक व कितना निश्छल
रिश्ता एक जो मन को भाया
वो है घने वृक्ष की मानिंद
सिर पे पूज्य पिता का साया

कितना था मासूम वो बचपन
तुमने हरदम लाड़ लडाया
मेरी खुशी में तुम मुस्काए
रूठी मैं तो मुझे मनाया
धीरे धीरे समझे रिश्ते
कौन पराए कौन हैं अपने
चलते चलते साथ में सबके
आंखों में बसे कुछ सपने

उन सपनों को पूरा करना
तुम्हारी बदौलत ही हो पाया

खुशियां तुमसे मिली तो ले ली
कही से जो दुख कभी भी पाया
तुम्हे सुनाया हर पीड़ा को
तुमने हर दुख दूर भगाया
छोटे छोटे दुख सुख सहते
जीवन की सीढ़ी पर चढ़ते
ऐसे सब कुछ समझ गये हम
यूं ही आगे बढ़ते बढते

तुमने मेरी हर मंजिल को
कितना ही आसान बनाया

पूरी करते सब इच्छाएं
इक दिन फिर ऐसा भी आया
सुखों से भरके मेरी झोली
डोली में था मुझे बिठाया
मां की कमी नही खलने दी
ऐसे था कर्तव्य निभाया
अपनी दुनिया में सब भूली
सबके साथ ही तुम्हे भुलाया
मैं भूली तुमको पर सिर पर
सदा ही हाथ तुम्हारा पाया

वट वृक्ष की तरह रखा
हम पर तुमने अपना साया

उस होनी का नियम अटल है
कोई नही उससे बच पाया
ऐसा ही वो क्रूर काल जब
चल कर निकट तुम्हारे आया
एक युग का अंत हो गया
सब कुछ साथ तुम्हारे खो गया
अब हैं बची तुम्हारी यादें
वो नश्वर शरीर सो गया

अब हम देते हैं बच्चों को
जो भी हमने तुमसे पाया


सुमन सचदेवा,शिक्षिका,मलोट,मुक्तसर

Loading...
SHARE
Previous articleये कदम पूछते हैं( गीत)
Next articleअन्तर्राष्ट्रीय पिता दिवस 18 जून 2017
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here