ये कदम पूछते हैं( गीत)

0
130

सभी मित्रों को नमस्कार बात 2005 की है ।पापा बहुत बीमार थे डाक्टर्स ने जवाब दे दिया था | उनका केवल दायाँ हाथ और दिमाग काम कर रहा था | पापा स्वयं बहुत बड़े गीतकार भी थे तो मैं ये सोच रहा था कि की एक गीतकार की सोच क्या रही होगी जब वो निश्चेष्ट होकर बिस्तर पर लेटा है | और अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहा है | मैंने उस काल खंड में उतरने की कौशिश की और एक गीत हुआ | मैंने पापा से पूछा कि एक गीत लिखा है सुनाऊं | बोल नहीं पाते थे मेरा हाथ दबाकर मुझे स्वीकृति दी | और जब सुन चुके तो जितने लोग वहां मौजूद थे वो और पापा सभी की आँखों में आंसू थे | मित्रों मैं वही गीत आज यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ | आप कृपया इसे पढ़कर बताइये क्या मैंने पापा की भावनाओं के साथ न्याय किया है |

गीत

ये कदम पूछते हैं मुझसे अब कितना और चलोगे तुम 
गीली लकड़ी की बस्ती में अब कितना और जलोगे तुम |
माना तुम क्षमता के नायक ,
हो सृजन तीर्थ के उन्नायक |
बहते आंसू मन की कराह को ,
गाते हो अद्भुद गायक |
हिमगिरी सा मस्तक बोल उठा ,अब कितना और गलोगे तुम |
गीली लकड़ी की बस्ती में अब कितना और जलोगे तुम |
तुम कतरा भी और सागर भी ,
हो स्त्रोत स्वयं और स्वयं अंत |
तुम पल भर में सिमित लगते ,
और पल में हो जाते अनन्त |
कह कर आँखों ने पूछा फिर ,अब कितना और छलोगे तुम |
गीली लकड़ी की बस्ती में अब कितना और जलोगे तुम |
हो तितली भंवरा फूल कलि ,
तुम पवन आग पानी बिजली |
हो शब्द साधना में विलीन ,
फैलाते खुशबू गली गली |
मन ने पूछा रुक कर मुझसे ,क्या इसी तरह मचलोगे तुम |
गीली लकड़ी की बस्ती में अब कितना और जलोगे तुम |
तुम दीपक हो तुम ही बाती,,
तुम अक्षर हो तुम ही पाती |
मैं देख चुकी हूँ कई बार ,
तुम धर्म कर्म की हो थाती |
कह कर पूछा परछाई ने ,कब वस्त्र मेरे बदलोगे तुम |
गीली लकड़ी की बस्ती में ,अब कितना और जलोगे तुम |


बनज कुमार बनज
09414053285

Loading...
SHARE
Previous articleसाया !! (गीत)
Next articleपिता का साया
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here