तू ही मेरा संत महान

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       तू ही मेरा संत महान 

 

न जाने कितनी ही बार लड़खडाते कदमोंं को संभाला होगा
न जाने कितनी ही बार गिरने से बचाया होगा
न जाने कितनी ही बार गोद में लेकर थपकी दी होगी
न जाने कितनी ही बार कितने जतन किये होगें
मेरी हंसी खुशी के लिए
न जाने कितनी ही बार मेरे निराशा के काली रातों को
आशा की सुबह में बदला होगा
न जाने कितनी ही बार मेरे हताश को जोश में बदला होगा
न जाने कितनी ही बार मेरे मौन से ही ,
मेरे दिल का हर एहसास समझा होगा
ज़ीवन में कितने रिश्ते हैंं पर
किसी रिश्ते में इतना ज़ीवन नहीं ,
सुख नहीं , खुशी नहीं , शांति नहीं
तू अपने साहस मेहनत से मुझे सींचता रहा
तू ही मेरी धरती भी
तू मेरे सम्मान सुरक्षा का संरक्षक बना रहा
तू ही मेरा आकाश भी
तू बूंद-बूंद कर स्नेह प्रेम से ज़ीवन को भरता रहा
तू ही मेरा सागर भी
निर्मल कोमल पवित्र सा ह्रदय तेरा
तू ही मेरा गंगा भी
तू उपदेशक मार्गदर्शक गीता सा
तू ही मेरा कृष्ण भी
तू संस्कार मर्यादा का धोतक सा
तू ही मेरा राम भी
जो भी मेरे पास है सब तेरा दिया हुआ
तू ही मेरा दाता भी
तू ही मेरे ज़ीवन का सत्य भी ,
शिवम् भी ,
सुन्दर भी
तू ही मेरा संत महान .
ख्वाहिशें मेरी भी है
तेरे कंधे का बोझ कुछ कम कर सकूँ
तेरे ज़ीवन के तप्त मरु में बरगद सा छाँव बन सकूँ
तेरे मान सम्मान में चार चांद लगा सकूँ
तेरे ज़ीवन के लिए न विप्लव बन सकी
न हुंकार सकी ,
न ललकार सकी
समाज की रीति – रिवाजों को
न तोड़ सकी उस बंदिशों को
मैं “अर्पणा” न बन सकी , कुछ न अर्पण कर सकी
न शोभा ही बन सकी , न तेरी शोभा बढ़ा सकी
किंतु ये कोशिशें ख्वाहिशें क्यों आखिर कब मानव ईश्वर को कुछ भी लौटा पाता है 
क्या यह संभव है कि
ईश्वर के उपकारों का कर्ज़ चुका पाएगा
हम जितने भी आधुनिक होंं 
वैज्ञानिक होंं 
यह असंभव ही रहा सदा
यह असंभव ही रहेगा सदा
पूजा अर्चना भी तो आत्मसंतुष्टि का ही मार्ग है

अर्पणा संंत सिंह,जमशेदपुर

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