नरेश मेहता:अक्षर शिल्पी

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*नरेश मेहता यानि शोर से दूर अक्षर- शिल्पी*

आधुनिक हिंदी कविता में कुछ कवि ऐसे भी हैं जिनका न तो डंका बजता है और ही आलोचकों नें उन पर ज्यादा कलम घिसाई की| नरेशकुमार मेहता ऐसे ही कवि हैं जिनके साथ लाव लश्कर नहीं के बराबर है| चूंकि ऊन्होंने सन् छत्तीस से पचास के दौरान खूब लिखा| ये छायावाद के एजेंडे को नकार रहे थे बस इसी नाते चर्चा से बाहर रहे व अन्य कवियों जैसे ‘ चमके’ नहीं|
वे साहित्य में नये प्रयोग व मुहावरे को स्थापित देखना चाहते थे|
बकौल *नरेश मेहता……..* संस्कृति बड़ा भ्रामक शब्द है फिर भी संस्कृति पर शोध तो की ही जा सकती है इस प्रयोग के आधार पर मेरी ‘उषस्’ है|
उषस् उनकी चार खंड़ों मे छपी कविता है जिसकी विषयवस्तु ऋतु का आह्वान करता कवि सूर्य से गेहूं में रस भरने की याचना करता है|
*उनकी एक कविता*

*किरन धेनुएँ*

उदयाचल से किरन धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला
पूँछ उठाये, चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ, इसी भूमि का
सारस सुना सुना बोली|
गिरता जाता फेन मुखों से
नभ मे बादल बन तिरता
किरन धेनुओं का समूह
यह आया अंधकार चरता……|

तारसप्तक मे समय- देवता नरेश जी की काफी लंबी कविता है , जो जीवन के विविध पहलुओं को उजागर करती है|
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*प्रस्तुति*…..
*सन्तोषकुमार तिवारी*
रामनगर…नैनीताल

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