बेडियाँ अब पड़ गईं हैं( गीत)

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  गीत  (राजकुमार सोनी)

बेडियाँ अब पड़ गईं हैं सत्यता के पाँव में।
हो गई देखो मिलावट नीम की भी छाँव मेंं।
मौन है परमात्मा कलयुग कसौटी पर खरा।
छेद अब दिखता मुझे है जिन्दगी की नाव मेंं।
हैं व्यथित आकाश तारे औ’ व्यथित अपनी धरा।
मोह माया में फँसा मानव हुआ है बाँवरा।
आत्माँए है तड़पती पत्थरोंं के गाँव मेंं।
बेडियाँ अब पड गईं है सत्यता के पाँव मे।
धर्म भी लाचार दिखता वासना के सामने।
हर तरफ रावण खडा है वंदना के सामने।
आज झरने भी फँसे है पानी के ठहराव में।
बेडियाँ अब पड गईं है सत्यता के पाँव मे।
बागबाँ वचनों मेंं अपने राज है जकड़ा हुआ।
हाथ में है हथकडी हर साज है जकड़ा हुआ।
सूर्य भी उलझा हुआ है वक्त के बदलाव मेंं।
बेड़ियाँ अब पड़ गईं है सत्यता के पाँव मेंं।
राजकुमार सोनी
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