असहज हिरनी

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‘असहज हिरनी ‘ (डॉ.यासमीन खान)

लड़खड़ाती सी
चल रही थी वो
सर पर बड़ी गठरी थी घास की
पहने हुए कपड़े
जगह-जगह से तार- तार थे,
आँखें सुर्ख़ थीं गोया,
डूबते सूर्य की आभा
इन्ही में सिमट गयी थी।

चेहरा बोझिल और
थका थका सा था
क़दम बढ़ते हुए
डगमगा रहे थे
कातर नैनो से
असहज हिरनी की भाँति
कपकपाती चाल से
सशंकित उचटती सी
निगाह डाल लेती पीछे,
मानों किसी का
बेहद डर हो,
कोई भयानक साया उसे आगोश
में जकड़ लेना चाहता हो।
कुछ दूर चल कर लड़खड़ाकर
मुँह बिसूरती हुई
धड़ाम से धरती पे गिर पड़ी।

ये गाँव के सुखवा की बेटी
पूनम थी जो खेतो में
काम करके
गुज़ारा करती थी,
पेट भरने की क़वायद में जुटी रहती थी,
और सदा खिलखिलाती
मुस्कराती ही नज़र आती थी।

आज किसी हवस के मारे वहशी दरिंदे ने
उसकी ये हालत
बना डाली थी,
पपड़ाये सूखे होंठ
मुस्कान नाम की
चीज़ ही भूल गये थे।

ख़ाली दिमाग़ से
पागल की तरह आसमान को एक टक घूरे जा रही थी,
होठ कांप रहे थे पर शब्द नहीं निकल रहे थे।

सड़क से मिले खेत में
कई लोग जमा हो गये थे
तरह तरह के सवाल
कर रहे थे
मगर वो किसी भी सवाल
का जवाब देने की
हालत में नहीं थी,
बहुत देर बाद उसके मुँह
से पहला वाक्य निकला था
अमीरों से क्या कहना
सब एक से होते हैं
गरीबन का दर्द का
जान पायेंगे ?
कुछ बचा नाही।

पूछ पुछव्वल से का होयगो ?
हमन पहले जैसे नहीं
बन सकत हैं।
उसके मुँह से निकले
शब्दोंने हक़ीक़त की
धरा पर पटक दिया था।

सारे जहाँ से अच्छा
हिंदुस्तान हमारा
जैसे बोल ,कानों
को दुःख देने लगे थे।
पूनम ने नारी मन की अथाह
पीड़ा उडेल डाली थी।
आज भी नारी सुरक्षित नहीं
दुनिया चाँद पर भले
ही पहुँच गयी हो।

डॉ.यासमीन ख़ान,मेरठ

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