विश्वास

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 विश्वास (मोनिका शारदा,अमृतसर)

बारहवीं कक्षा अच्छे अंकों में पास करने के पश्चात चंडीगढ़ के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला मिल चुका था। दाखिला तो बेटे को अपने अमृतसर शहर केविश्वविद्यालय में भी मिल जाता लेकिन बेटे की इच्छा थी कि मैं छात्रावास में रहकर ही पढ़ाई करूँ सो बेटे की इच्छा को ध्यान में रखते हुए उसे चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ने की स्वीकृति दे दी क्योंकि पढ़ना तो उसी को था।छात्रावास भेजने से पहले मन चिंतित भी था क्योंकि पंजाब के युवाओं में बढ़ते नशे की समस्या के बारे में आये दिन समाचार पत्रों, मीडिया के माध्यम से समाचार पढ़ने-सुनने को मिलते ही रहते थे। छात्रावास में रहने के प्रति जानने के पश्चात रिश्तेदार भी इस समस्या से संबंधित बातें बताते और चौकन्ने रहने के लिए समझाते।ऊपर से तो मैं संयत रहती परंतु भीतर से चिंतित भी।लेकिन हमने बेटे को अपनी चिंता महसूस नहीं होने दी और उसे निश्चित समय पर छात्रावास छोड़ आए।लगभग छः माह गुजर जाने तक जब मैं उसकी तरफ से निश्चिंत हुई तो एक दिन उससे इस बारे में खुलकर पूछा बेटे, “वहां छात्रावास में बच्चे नशा वगैरह तो नही करते?”बेटे ने प्यार से मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा,”माँ वहां हर तरह के लड़के हैं लेकिन कोई किसी को किसी बात के लिए मजबूर नहीं करता। आप निश्चिंत रहें आपने मुझे वहां जिस विश्वास के साथ पढ़ने के लिए भेजा है मैं आपका वह विश्वास कभी टूटने नहीं दूंगा।यह मेरा आपसे वायदा है।”एक मां होने के नाते मुझे अपने इस संस्कारी पुत्र की बात सुनकर राहत भी महसूस हुई और उस पर नाज़ भी।

मोनिका शारदा
अमृतसर

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