रुहानी नूर और शोर्य के प्रतीक: श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब

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 रुहानी नूर और शोर्य  के प्रतीक: श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब 

भारतभूमि पर बहुत पहले भगवान कृष्ण ने एक घोषणा की थी ” अत्याचार सहना, अत्याचार करने से बड़ा पाप है “….बात मध्यकालीन भारतीय इतिहास में पैदा हुए एक संत मत की ,जिसे हम सिक्ख धर्म कहकर पुकारते है..यह ज्योत अति सहनशीलता से प्रज्ज्वलित हुई..अति सहनशीलता को समेटे हुए पांचवे नानक तपती हुई रेत और तवी को सहज ही स्वीकार कर गये… लेकिन लाहौर  शहादत के लिए जाते समय उन्होंने अपने 11 वर्षीय पुत्र हरगोबिंद को 2 तलवारें भेजी थी…ये तलवारें एक मूक सन्देश था..जिसे लागू किया  छठे नानक हरगोबिंद जी ने….

      आपका जन्म 19 जून 1595 को गुरु की वडाली(अमृतसर) गुरु अर्जुन देव जी के यहां माता गंगा देवी की कोख से हुआ ।आपको रूहानियत और शौर्य दोनो विरासत में मिले थे…अपने पिता से,भाई गुरदास जी से और बाबा बुड्डा जी से…

       पांचवे नानक की शहीदी एक सन्देश देकर गयी थी छठे नानक को कि..”अब केवल माला नही शमशीर भी धारण करनी होगी..अगर धर्म बचाना है तो..”इसे हम इतना समझ सकते है कि खालसा का प्रचंड सूरज चमकने से पहले पूरब से उठने वाली लौ थी छठी पातशाही का आगमन..उन्होंने एक सेना बनाई,राजसी चोला पहना,संगत को फरमान जारी करना शुरू किए ,जिसके लिए अकाल तख्त का निर्माण करवाया..घोड़ों की खरीद-फरोख्त शुरू की और कुछ लड़ाइयां मुगलों के साथ लड़ी..(गुरुसर,कीरतपुर, रौहिला,अमृतसर और करतारपुर की लड़ाइयां …)आज भी हरिमन्दिर साहिब में अकाल तख्त की बगल में रिवायती तौर पर 2 निशान साहिब स्थापित है ,जो मीरी पीरी के प्रतीक है ..मीरी का अर्थ है ओहदा और पीरी का अर्थ है धर्म..गुरु जी ने राजनीति और धर्म  को एक दूसरे के पूरक बताया …लेकिन धर्म को राजनीति से ऊंचा स्थान दिया..दोनो निशान साहिब में पीरी के प्रतीक  धर्म ध्वज को ऊंचा रखा गया है ।

जहांगीर ने सोचा था कि गुरु अर्जुन देव जी की शहीदी सिक्खी का नामोनिशान मिटा देगी…और उसी परम्परा को आगे ले जाते हुए    उसने गुरु हरगोबिंद जी को बंदी बनाकर ग्वालियर की जेल में डाल दिया,यहां उन्हें 12 साल कैद रखा गया…यहां एक सुंदर रहस्य आपसे सांझा करने जा रहा हूं, कृपया गौर कीजिए…

   कश्मीर में एक माता थी,नाम था भागभरी.. नानक भक्त थी..लेकिन नानक दर्शन का सौभाग्य प्राप्त नही कर पाई थी..कश्मीर यात्रा में गुरु हरगोबिंद उन्हें खुद मिलने गए..उस बजुर्ग माता ने पूछा कि आप नानक हो ? आपने कहा ; हाँ..उसने सुन रखा था कि गुरु नानक खुले और बलिष्ठ शरीर के है …तो माता भागभरी ने एक चोला गुरु नानक के लिए बना रखा था ,जिसकी 52 कलियां थी..आपने माता से स्नेहपूर्ण यह चोला ले लिया और यही चोला उन्होंने 1519 में दीवाली के रोज उस दिन पहना था जब वह अपनी रिहाई के साथ- साथ 52 राजाओं को कैद से मुक्त करवाकर “बाबा बन्दी छोड़ ” बनकर ग्वालियर की जेल से बाहर निकले थे ।

 दरअसल माता भागभरी का वो 52 कलियों वाला चोला एक गुप्त सन्देश था जिसे गुरु हरगोबिंद जी ने समझ लिया था कि..”अधर्म के हाथों पीड़ित हो रहे 52 राजसी व्यक्तियों  को रिहा करवाना है आपको ..लेकिन उनके साथ कैद में रहकर उन्हें सत्यमार्ग से जोड़ना है ,उनके अवगुणों को धोकर उन्हें ऐसे हाकिम बनाना है जो कि द्धर्म स्थापना में सहायक हों “सिक्ख धर्म की दीवाली वास्तव में “बन्दी छोड़ दिवस” है…

 संतो के घर संत रूहों का ही आगमन होता है…तो इनके यहां 5 पुत्र और एक बेटी का जन्म हुआ..आपकी शादी माता ननकी,माता महादेवी और माता दमोदरी जी से हुई..आपके 5 बेटों के नाम बाबा गुरदिता जी,बाबा सूरजमल जी,बाबा अणी राय जी,बाबा अटल राय जी ,बाबा तेग बहादुर जी(9वी पातशाही) और बेटी का नाम बीबी बीरो जी था ।आपके पांचों बेटे सन्त तबियत थे( बाबा अटल राय जी देह त्याग चुके थे,गुरदिता जी,सूरजमल जी संत यां वैरागी थे और गुरु तेग बहादुर जी भावलीन रहकर अपनी इस जन्म की तपस्या पूरी कर रहे थे )अतः आपने गुरुगद्दी अपने पोते हरराय जी को सौंपी जो कि बाबा गुरदित्ता जी के सपुत्र थे।

 दोस्तो ! गुरु हरगोबिंद जी का सिक्ख धर्म में एक क्रांतिकारी योगदान है…जो सतगुरु 12 साल खुद कैद में रहकर 52 राजाओं को धर्म स्थापना के लिए मुक्त करवाता है उस सतगुरु का यही संदेश है कि हर राजनीति से उठकर धर्म की राह पर चलो..”पीरी हृदय में धारण करो और मीरी की शमशीर माज़ूर और लाचार (चाहे वो किसी भी मज़हब का हो),की रक्षा के लिए उठाने से गुरेज ना करो…19 मार्च 1644 को आप कीरतपुर में ज्योति ज्योत समा गए ….

राजकुमार (शिक्षक)

9592968886,अमृतसर,पंजाब ।

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