कुदरत की आवाज़–कबीर

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कुदरत की आवाज़– कबीर         (राजकुमार,शिक्षक )

एक बहुत ही विलक्षण सच्चाई एक ऐसे व्यक्ति ने दुनिया में बयान की जो कभी दुनिया के किसी स्कूल में नही गया और कोरा अनपढ़ था..क्या खूब कहा उसने….
कबीर जब हम पैदा हुए जग हंसे हम रोये
ऐसी करनी कर चलो हम हंसे जग रोये…
कितनी बड़ी सच्चाई और कितने सीमित शब्दो में कहने की कला केवल एक व्यक्ति के पास थी…नाम था ——कबीर
कबीर अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “महान”..और कोई शक नही कि कबीर बहुत ऊंची आत्मा का नाम है । भक्तिकाल में सन 1398 को वाराणसी में लहरताल(सरोवर) के पास एक बच्चा किसी जुलाहे दम्पति को मिला ,जिनकी कोई संतान नही थी उनका नाम था नीरू और नीमा.. ये धर्म के मुसलमान थे और वो रब्ब के बहुत शुक्रगुजार हुए कि उसने उनकी झोली औलाद से भर दी है..सुना है कबीर किसी अविवाहित ब्राह्मण स्त्री के घर पैदा हुए थे जो कि इन्हें लहरताल सरोवर के पास छोड़कर चली गयी थी और नीरू नाम के जुलाहे और उसकी पत्नी नीमा ने कबीर का पालन पोषण किया था ।देखिए एक समानता नज़र आती है कि जन्म कहीं और हो रहा है और पालन पोषण कहीं और…कुछ कुछ श्री कृष्ण से मिलता हुआ ।
कबीर के संचित कर्म बेहद ऊंचे थे और वैराग्य होश सम्भालते ही इनमे घर कर गया था ।गरीब जुलाहे का घर था लेकिन नीमा जुलाहे का बेटा ईश्वर की चर्चा में समय व्यतीत करता था और माता पिता इनसे इतने प्रसन्न न थे..लेकिन कबीर अपनी राह चलते गए…प्यास बढ़ती गयी और कबीर निकल पड़े गुरु की तलाश में । बनारस में उन दिनों रामानन्द पहुंची हुई आत्मा थे ,कबीर उनके पास गए लेकिन रामानन्द ने उन्हें दीक्षा देने से इंकार कर दिया ..क्योंकि एक कबीर की जात छोटी दूसरा मुसलमान…तो रामानन्द शुद्ध ब्राह्मण थे ।लेकिन कबीर ने मन में पक्का निश्चय किया कि वह रामानन्द से ही दीक्षा लेंगे…तो एक रात आखरी पहर से कुछ पहले कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पे लेट गए ,वही पे हर रोज अमृत समय में रामानन्द जी गंगा स्नान को आते थे ।जैसे ही उनके पांव ने कबीर के शरीर को स्पर्श किया तो वो बोल उठे ; उठो भक्त ,राम कहो । बस यहीं कबीर की अलौकिक दीक्षा हुई और उन्होंने रामानन्द के राम शब्द को प्राणों में बसा लिया और अध्यात्म का ऐसा सफर शुरू हुआ जो कबीर को बुलंदियों तक लेता गया ।कबीर खुद कहते है कि

काशी में प्रगट भये रामानन्द चेताये

कबीर के परिवार ने उन्हें अध्यात्म की राह से वापस लाने के लिए उनकी शादी लोई नामक औरत से कर दी और उनकी 2 औलादें हुई…बेटा कमाल और बेटी का नाम कमाली… कबीर का बेटा कमाल पिता विरोधी था और उनका अनुसरण नही करता था ।कबीर खुद फरमाते हैं कि…

बूड़ा बंस कबीर का,उपजा पूत कमाल
हरि का सिमरन छोड़ के,घर ले आया माल

कबीर के घर सन्तो,साधुओं और सन्यासियों का जमावड़ा लगा रहता था..घर में फांके हो जाते थे लेकिन साधू सन्त भूखे नही जाते थे..इनकी पत्नी लोई को दिन रात साधु संतों की आवभक्त करनी पड़ती थी..कबीर का घर केवल एक घर न रहकर कांशी में एक ऐसा डेरा बन चुका था जहां उच्च आत्माएं हमेशा विधमान रहती थी..बड़ा सुंदर फरमाया आपने कि..

साई इतना दीजिए,जा मेंं कुटुम समाए
मैं भी भूखा ना रहूं साधू भी भूखा ना जाए
मुझे कबीर एक रूप मे इतने हैरान करते है कि शायद ऐसा वृतांत अति दुर्लभ है ।एक रात एक चोर जिसके पीछे बस्ती के लोगों की भीड़ लगी थी उसे मारने के लिए..वो बचता बचाता कबीर कुटिया में आ गया ,भक्त जी समाधिस्थ थे..चोर ने शरण मांगी..आपने अंदर की चारपाई पे चद्दर ओढ़ के सोने का इशारा किया..जिस चारपाई पर चद्दर ओढ़कर कबीर जी ने उस चोर को सोने को कहा था वहां पहले ही से कोई सोया हुआ था ।चोर वहां उसी चादर में छिप गया,भीड़ कबीर जी के पास आई और उनसे चोर के बारे में पूछा..कबीर बोले यहां कोई चोर नही आया और भीड़ चली गयी..चोर बच गया और भक्त जी के पांव पड़ गया..भक्त जी ने कहा कि तुम हमारी शरण आये हो ,अब यहीं रहोगे.. दरअसल जिस चारपाई पे चोर ने चद्दर ओढ़कर अपनी जान बचाई थी उसी चारपाई पे कबीर जी की बेटी कमाली उसी चद्दर में सोई हुई थी…कबीर जी ने उस चोर को अपना दामाद बना लिया और उसका जीवन बदल गया । एक पिता होने के नाते ऐसा साहसिक कदम मुश्किल नही नामुमकिन है ..आज के दौर में भी ।
कबीर जी अति साहसिक,सादा और विद्रोही तबियत इंसान रहे है…मुसलमान के घर में पलकर हिन्दू गुरु धारण करना एक साहसिक और विद्रोही कदम था जो उन्होंने उठाया ।उन्होंने कर्म कांडों और इस्लामी रिवायतों का जम कर विरोध खुले तौर पे किया ।अपने बड़े साफ शब्दों में कांशी जैसे हिन्दू गढ़ में फरमाया कि….

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार
तासे ये चक्की भली,पीस खाये संसार

दूसरी तरफ इस्लाम को यह कहकर फटकारा कि…

कंकड़ पत्थर जोड़ कर मस्जिद लियो बनाए
ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाए

दरअसल कबीर अपने अंतर में वो ज्योत जला चुके थे ,जिसकी लौ सब अंधेरे मिटा देती है और सभी डर समाप्त हो जाते है ।तभी तो वो इतनी निडरता से सबकुछ बोल रहे थे …दरअसल वो अंतर में उस प्रीतम को पा चुके थे..हर माला से दूर,हर मन्दिर से दूर,हर कर्म कांड से दूर…केवल सुमिरन से केवल ,नाम से…आप ने फरमाया कि…

माला फेरत जुग गया,मिटा न मन का फेर
कर का मनका डार दे,मन का मनका फेर…

कबीर ने कुदरत के गहरे रहस्यों को पा लिया था और अपने अनुयायियों को ही नही बल्कि
उस दौर के सभी जिज्ञासुओं को यह भेद बांटने शुरू कर दिए थे..आपने रूह की अमरता और शरीर की नश्वरता को अति सहज शब्दों में बयान किया था..आपने फरमाया कि…

माटी कहे कुम्हार से,तू क्या रौंदे मोहे
इक दिन ऐसा आएगा,मैं रौंदूगी तोहे

वह दुखों में,मुसीबतों में मुस्कुराकर और निडरता से जीना सीख गए थे..तभी तो कहते हैं कि..

दुख में सुमिरन सब करें,सुख में करे ना कोये
जो सुख में सुमिरन करे,तो दुख काहे को होये…

कबीर जात के छोटे थे लेकिन शख्सियत इतनी ऊंची बनाकर भी ज़मीन से जुड़े एक विद्यार्थी की तरह जीते रहे..आपने फरमाया कि…

निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना,निर्मल करे सुबाय..

कबीर ने धीरज को सराहा और अहंकार को जम कर कोसा ,आपने धीरज को धारण करने के लिए फरमाया कि..

धीरे धीरे रे मना, धीरे सबकुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा,ऋतु आये फल होय..

अहंकार को फटकारते हुए आपने कहा कि…

बड़ा हुआ तो क्या हुआ,जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नही ,फल लागे अति दूर…

दोस्तो !कबीर शब्द की तरह कबीर साक्षात एक चलता फिरता विराट दर्शन बन चुके थे..निरक्षरता पे हंसने वाले साक्षर उनसे चारो खाने चित हो चुके थे ,आपके भक्तों ने आपके मुख से निकली अमृत गंगा को कलमबद्ध किया और आपकी वाणी “बीजक कबीर ग्रंथावली” के नाम से भक्ति साहित्य का शिरोमणि हिस्सा है ।इसके तीन भाग हैं ।
1.साखी.. दोहों के रूप में आपकी शिक्षाएं
2 . सबद..आपकी भाव प्रस्तुति(संगीतमय)
3 .रमैनी..आपका रहस्यवादी काव्य दर्शन

कबीर रामानन्द के शिष्य थे जो कि रामभक्त थे..लेकिन कबीर के राम ,राजा दशरथ के पुत्र राम नही बल्कि साक्षात सगुण राम है यानी कि जीते जागते लोगों में बसने वाले राम..उनका राम ब्रह्म शब्द था जो कि सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड का नाद है ,कबीर उस राम की बात करते है जो घट-घट में रमा है,समाया है..

“निर्गुण राम जपहु रे भाई”

यही बात सबकुछ बता देती है कि कबीर का नाता किस राम से है..हां कबीर गुरु और नाम को बेहद महत्व देते है…आप फरमाते हैं कि….

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, का के लागो पाय
बलिहारी गुरु अपने,जिस गोविंद दियो मिलाय…

कबीर की कुटिया उस दौर में भक्ति बांट रही थी,नैतिकता बांट रही थी,संस्कार बांट रही थी…यही बात हर सन्त को पीड़ा और सूली तक ले जाती है..हिन्दू और मुस्लिम आपके चिराग के नीचे रौशनी की तलाश में इक्कठा होना शुरू हो गए थे…उनका बुरा चाहने वालो की भीड़ बड़ी होती जा रही थी लेकिन ऐसे मैं कबीर कूक रहे थे कि…

कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर

अंततः आपके विरोधियों के कारण आपको कांशी(बनारस)छोड़कर मगहर जाना पड़ा..आप उम्र दराज़ हो चुके थे और वहीं पे 1518 ईसवी को 120 साल की उम्र में कबीर जी ने दुनिया को अलविदा कहा..कहते हैं नानक की तरह इनके पार्थिव शरीर को लेकर हिन्दू-मुसलमान झगड़ पड़े थे..और जब चादर शरीर से उठाई गई तो केवल पुष्प बचे थे..दरअसल सत्य यह है कि संत फूलों जैसे होते है..इनकी महक हमेशा बरकरार रहती है..जैसे कबीर हमेशा महक रहे है…किताबी शिक्षा रूहानी शिक्षा के सामने दो कौड़ी मूल्य नही रखती..प्रेम की जो परिभाषा कबीर निरक्षर होकर दे गए है ,वो दुनिया का बड़े से बड़ा साक्षर ना दे पाया न ही दे पाएगा…

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया ना कोये ।
अढ़ाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होये। ।

उनके लिए मैं इतना ही कहूंगा कि—-

एक जुलाहे ने बुनी, राम नाम की लोई..
जिसने भी ओढ़ा इसे ,पा गया उसको सोई..
राम नाम के धागों को ,बुन गया वो फनकार..
इस जग को वह दे गया..हरि नाम भंडार..
गुरु ग्रंथ जी में बोलते 243 बार कबीर..
अंधविश्वासों की काट दी,उन्होंने हर ज़ंजीर…
काशी नगर के झोंपड़े में..रहता था एक फकीर…
कोटि कोटि प्रणाम है ,तुझको भक्त कबीर….

राजकुमार,शिक्षक,अमृतसर।

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2 COMMENTS

  1. बेहद खूबसूरत सुंदर शब्द चयन एवं अभिव्यक्ति !!
    सत्य है कबीर जी हर दिल की आवाज़ हैं…हार्दिक बधाई..राजकुमार जी!!

  2. बहुत बहुत बधाई….बहुत बढ़िया प्रस्तुतिकरण…..

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