यादों के झरोखे से

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‘यादों के झरोखे से सुनहरी शरारती पल’ (डॉ.यासमीन खान)

बात है उन दिनों की जब कहानियां सुनने का बेहद शौक़ था,रंग बिरंगी परियां हाथ में जादू की छड़ी लिए अपने सपनों में हर रोज़ आया करती थी। अपनी शरारते उत्तुंग पर विराजमान थीं। मौहल्ले में एक जंगलजलेबी नाम्ना बड़ा सा पेड़ था। जब उस पर जंगलजलेबियां लद जातीं तो सारे मौहल्ले के बच्चे पेड़ के इर्द- गिर्द ऐसे मंडराते जैसे मधुमखियां अपने छत्ते पर मंडराती नज़र आती हैं। हम तो फिर ख़ासे चंचल थे,और शरारतों एवं पेड़ पर चढ़ने की कला में माहिर थे।
पेड़ के क़रीब जाने के सौ बहाने तलाशते थे हम
अम्मी से कहते कुछ सामान तो नहीं मंगवाना बनिये के यहां से,बड़ी बहन से पहले ही सांठ गांठ कर लेते थे, अम्मी का मंगाया सामान लेने जाते हुए; और कभी अम्मी से इजाज़त लेकर जा धमकते जंगल जलेबी के पेड़ के नीचे, विशाल पेड़ की विशालता से अधिक दुश्वारी पैदा करता उस पेड़ के निकट रहने वाला उड़ना सांप। पेड़ तालाब से सटा हुआ था पानी का उड़ना सांप वहां रहा करता था। हरे रंग का,कई लोगों के उसने काटा था,माथे पर काटता था। उस सांप के काटने से एक 35 साल के मर्द की मौत हो गयी थी।एक दिन हमने भी उसे उड़ते हुए देखा था दूर से देखते ही सारे बच्चे नो दो ग्यारह हो लिये थे। लटकी हुई जंगलजलेबियां इतनी आकर्षित करती कि उस वक़्त ज़ेहन सांप के ख़ौफ़ से आज़ाद हो जाता। बड़ा मसअला रहता पेड़ की ऊंचाई से फल हासिल करना। इस मक़सद के लियें भी जानकार तैयार रहते वो लग्गी, लम्बा बांस साथ लेकर आते थे जिसकी सहायता से जंगलजलेबी तोड़ने की सब ज़ोर आज़माइश करते। मेरा भी नम्बर आता तोड़ने का और साथियों से कहती नीचे गिरते ही जंगलजलेबी पर कब्ज़ा जमा लेना, क्योंकि दूसरे दबंग बच्चों का ग्रुप भी छीनने को घात लगाये तैयार रहता था। बड़ी बहन को सख़्त हिदायत देती डरना नहीं किसी से भी,जैसे ही मैं तोडूं फौरन उठा लेना वो कहती सही है । मैं तोड़ना शुरू करती और लाल लाल रंगदार पक्की पक्की जलेबियों को लग्गी में इलझाकर ज़ोर का झटका देती जंगलजलेबियां गोल-गोल ठुमकती,बलखाती नाचती ज़मीं पर आ गिरतींऔर साथी उठाने में व्यस्त हो जाते । दूसरे बड़े बच्चे जो दबंगई दिखाते उनकी दादागीरी रोकने के लिए, फल तोड़ते तोड़ते मुझे कुछ पल रुकना पड़ता। और जो बच्चे मेरी बड़ी बहन और मेरे साथियों को धमकाकर उन्हें पीटकर फल छीनते, उनके पिन चुभाकर कहती, दफ़ा हो जाओ वरना तुम्हारे घर जाकर अभी कह दूंगी,सबको मार रहे हो। टूटी हुई में से कच्ची-कच्ची सी कुछ जंगल जलेबियाँ उन्हें थमा देती ये कहते हुए जब तुम ख़ुद मेहनत नहीं करते तो क्यों तंग करते हो,तुम यही खाओ वरना ये भी नहीं दूंगी वो रख लेते। मैं फिर तोड़ने में मसरूफ़ हो जाती और जब बहुत सारी जमा हो जातीं और जमा हुई जंगलजलेबियों के ढेर पर मेरी नज़र पड़ती तो ख़ुद को बड़ा तुर्रम ख़ान समझती और अपनी मेहनत,सुखबूझ पर फूले नहीं समाती,अपनी नज़रों में खुद की बलैयां लेती। आज सोचते हुए हंसी आ रही है हाहा उस बचपनी दबंगई और बातों पर। तब जमा की गईं जंगलजलेबियां अपने सब साथियों में बराबर बांटी जातीं। जो कुछ कच्ची होतीं उन्हें कागज़ में लपेट कर कनस्तर में रखती दो ,तीन दिन में जब पक जातीं तब खाती। जंगलजलेबियों को हासिल करना आसान नहीं था मगर हम हासिल करते और उनका भरपूर आनन्द लेते। आज अनायास ही बचपन की याद ज़ेहन में कौंध गयीं जब बस में सफ़र करते हुए जंगकजलेबी के पेड़ पर नज़र जम गई तो लिख दीं बचपन की यादें जो हीरे जवाहरातों से कम नहीं होतीं।

डॉ.यासमीन ख़ान
पीएच.डी हिंदी,पोस्ट डॉक्टोरल राजनीति वि.(इंडियन काउन्सिल ऑफ़ सोशियल साइंस रिसर्च)
ईमेल- yasmeen khan 9376@gmail.com

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  1. आपके प्रयास सराहनीय हैं प्रभु आपको आपार सफलता दें डॉक्टर साहिबा

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