उबलते नीर

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   उबलते नीर (अर्विना गहलोत)

एम .एस सी (वनस्पति विज्ञान) ग्वालियर यूनीवर्सिटी
वैद्यविशारद इलाहाबाद यूनीवर्सिटी
पति —श्री अशोक कुमार( डीजीएम)
विधुत नगर जिला गौतम बुद्ध नगर
एन टी पी सी दादरी

लघुकथा

सूरज की रश्मियों ने लगता है कसम खाली धरती को जला कर ही दम लेंगी।
“इस गगन को क्या हुआ ?
“क्यों मोन है ?
“अब तो प्यास से गला भी सूखने लगा है।
धरती की व्याकुलता बढ़ती ही जा रही है।अब तो गला चटखने भी लगा है , इसमें दरारे पड़ गई है ।इन ऊँची अट्टालिकाओं में रहनेवाले लोगों तुम्हें मेरा करुण क्रंदन सुनाई नहीं दे रहा है क्या ?
ए सी की शीतल वायु में गहन निद्रा में लीन हो । इस सूखे गले से आवाज ही नहीं निकल रही है।
” हे राम! हे राम! हे जानकी पुत्री कहाँ हो?
ञाहि माम ञाहि माम मुझे बचालो !मेरा तन झुलसा जा रहा है। इस कठोर निर्दयी मानव जिसने मेरे आवरण को खरोंच कर अपनी अट्टालिकाएं, जहर उगलने वाली चिमनियाँ ,बनाली है।
” पानी की कलकल चिड़ियों का कलरव अब मझे सुनाई नही दे रहा ।
“ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मेरी चेतना जा रही है ।”
” धरती के गालों पर उबलते नीर ढलक आये हैं।

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