लौट आओ बेटे !!

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लौट आओ बेटे !!(अपर्णा संत सिंह)

तिरंगे में लिपटा,खामोश
बेहद खामोश,जैसे सो रहा हो!
चेतना रहित,स्फूर्तिहीन,जड़वत् सा
मृत्यु के आगोश में,मुझसे दूर,सब से दूर
अनंत यात्रा पर!!
जहाँ से कभी कोई नहीं लौटा!
ऐसी बेबसी ,तड़प और दर्द
करोड़ों कांटों सी चुभन
हृदय में,मस्तिष्क मे!!
वेदनाओं का ज्वार,सुनामी सा!!
दो छोटी गुडि़या
न जाने दिन भर में कितनी बार
आने का इंतजार करती हैं, नम आँखों से!
उसकी यौवना की आंखें पथरा गई हैं
भविष्य के अंधकार से !!
बूढ़ा बाप लाडले के गम में हो गया जड़वत् !!
वह कहता था “माँ तू बहुत हिम्मत वाली है
और मेरी हिम्मत भी” !
कल तक इस अनमोल शरीर पर एक खरोंच न लगे
उसके लिए कितने वर्षों ,कितने जतन किए!
म जीवन भर की कमाई हुई यह अमूल्य धरोहर
दुश्मनों के लिए मात्र
जीत जश्न की वस्तु थी
उसका जान मात्र संकेत थी जीत का!!
यह दुश्मनी
बस अहंकार की!
दुश्मनी में क्या मानवता भी भूल जाते हैं
न जाने कितने जख्मों के निशान हैं
कितनी पीड़ा सहन की होगी!!
आज मेरा बेटा केवल एक लाश है,
जिसे अग्नि में भस्म करने के लिए
सम्मानपूर्वक लोग जुटे हैं!!
सभी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दे रहे हैं!!
उसके वजूद का हर अंश मिट जाएगा!!
मेरे हाथों में रह जाएंगी
केवल कुछ तस्वीरें,असंख्य यादें
और असीम पीड़ा
लौट आओ बेटा
“मैं इतनी भी हिम्मतवाली नहीं”!!

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