वृक्ष धरा के आभूषण(मुक्तक रचना)

1
937
सत्य प्रकाश सिंह (सत्या सिंह)
शैक्षिक योग्यता — एम. ए ( हिंदी)
जनम तिथि– ०१ फरवरी ७८
मो. न, ०९९५६११८१९९
ग्राम – डंड़ियामऊ,पो.–रानीकटरा,
जिला– बाराबंकी(उ. प्र.)
वृक्ष धरा के आभूषण(मुक्तक रचना)
1)
वृक्ष धरा के आभूषण है, आओ पेड़ लगाये।
बंजर धरती हरी भरी कर,जीवन सफल बनाये।
कर्ज उतारें धरती मांँ का,हो संरक्षित पीढ़ी।
फूल फलों शाखाओं सा हम,जीवन को महकायें।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
2)
प्राणवायु इनसे ही मिलती,मिलती है हरियाली।
रंग-बिरंगे फूल खिलाती,वृक्षों की हर डाली।
अौषधियां भी तरुवर देते,मनुज निरोगी करते।
हर विपदा में साथ निभाते,तना पात औ छाली।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
3)
कटे वृक्ष गर नही लगे तो,विपदा असमय होगी।
जीवन रेखा मानवता की,प्रति क्षण बस क्षय होगी।
अना वृष्टि धरती पर होगी , कहीं लगेगा सूखा।
जीवन होगा अंधकार मय,औ महा प्रलय होगी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
4)
वन ही से तो जन जीवन है, सब सच को स्वीकारें।
रोपे इक पौधा हर कोई,धरती रूप संँवारें।
चलो करे अच्छादित मां की, चूनर हरियाली से।
हरें भरें हों बाग-बगीचें, मांँ का रूप निखारें।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Loading...
SHARE
Previous articleपेड़ से ही तो’ जिन्दगानी हैby Dr.Purnima Rai
Next articleमहीप के चुनाव में (कलाधर घनाक्षरी )
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here