अनकहे जज्बात–2

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       उपलब्धि

(आत्मकथात्मक संस्मरण)

आज से लगभग 12–13साल पहले की घटना है।आप पूर्णिमा जी है न।यह वाक्य अपने पीछे खड़े एक युवक से सुनकर मैं हतप्रभ सी हुई।जी हाँ ,अभी मैं कुछ कहती ,अगला प्रश्न आया।आप अमर ज्योति स्कूल में पढ़ाते थे ? जी हाँ ।युवक के चेहरे पर आई प्रसन्नता से झलक रहा था कि कोई अचंभित करने वाली बात है।युवक के स्वर में ठहराव आया ,मैम,आपने मुझे पढ़ाया है ।सैमीनार में उपस्थित शिक्षक-शिक्षिकाओं में यह कौन है । मैं पहचान नहीं पाई थी ।यहाँ तो कोई छात्र बाहर से नहीं आये , अपने आप से सवाल करते हुये मैंने पल भर सोचा। फिर मैंने उस युवक से कहा –यहाँ सभी शिक्षक ही हैं। आप कैसे आये?क्या किसी के साथ सैमीनार अटैंड करने आये हैं? मैम ,मैं भी शिक्षक हूँ।अभी हाल में ही मुझे नौकरी मिली है । शिष्य का शिक्षक के स्तर पर आना ही मेरे जीवन एवं शिक्षण क्षेत्र में पहली कमाई है,सबसे बड़ी उपलब्धि है।
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

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