विश्व पर्यावरण दिवस(विशेषांक)जून2017

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विश्व पर्यावरण दिवस(विशेषांक)

           5 जून 2017

—-संपादकीय–(डॉ.पूर्णिमा राय)
कहते हैं साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक हैं।साहित्य समाज का आईना है जो हमें प्रतिदिन एवं निरंतर हो रहे जीवन मूल्यों में परिवर्तन को प्रतिक्षण लक्षित करता है।जिस तरह का साहित्य समाज में रचा जायेगा वैसा ही उस समाज का जीवन एवं जीवन शैली बन जायेगी।इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुये आज हम विश्व पर्यावरण दिवस 5जून 2017 हेतु साहित्यिक रचनाओं की गठरी बाँधकर पाठक वर्ग के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।हो सकता है आपको हँसी आयी होगी “गठरी बाँधकर” पढ़कर !!यां अलग से विचार आपके मस्तिष्क में कौंधे हों।आज जिस तरह साहित्य लेखन में हर आयु वर्ग के रचनाकार ,हरेक पेशे /व्यवसाय से संबंधित रचनाकार सृजन कर रहें हैं,जितना महत्वपूर्ण हैं ,उतना ही महत्वपूर्ण है….उनकी साहित्यिक रूचि देखकर साहित्यिक रचनाओं को सहेजना एवं पाठकों के सामने लाना भी नितांत आवश्यक है।मानव और प्रकृति का रिश्ता जन्म जन्मांतर का है। सदैव प्रकृति के नाना रूपों का दिग्दर्शन कवि, साहित्यकारों की रचनाओं में समय-समय पर होता रहा हैजिसका लक्ष्य मानव के मन में
प्राकृतिक तत्वों के साथ संतुलन बनाये रखने का संदेश छिपा रहता है। पर्यावरण यानि हमारे आस-पास का माहौल,गतिविधियाँ,क्रिया-कलाप जिसने मानव मन को सदैव प्रभावित किया है।पर्यावरण ,हमारी भौगौलिक संरचना ,जलाशय,वायुमंडल,पृथ्वी सबमें परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है। जिससे मानव जीवन की जीने की अवधि पर असर हो रहा है।हमारे इस विशेषांक के रचनाकारों —(पुरुष एवं स्त्री ) ने अपने आलेख,दोहों,घनाक्षरी ,मुक्तक ,सुंदरी सवैया ,गीत,
गीतिका,लघुकथा,एवं कविताओं के माध्यम से सामाजिक ,धार्मिक,प्राकृतिक,साहित्यिक पर्यावरण के आधार पर अपनी धरती की पवित्रता,जल भंडार की शुद्धता,वृक्षारोपण,वन सरंक्षण,की बात करके अपनी रचनाओं की श्रेष्ठता सिद्ध कर दी है और पाठक वर्ग एवं समाज के सामने उदाहरण पेश किया है कि रचनाकार महज मनोरंजन हेतु ,आनंदानुभूति ,
स्वांतः सुखाय हेतु ही सृजन नहीं करता बल्कि समाज के लोगों को सचेत करने हेतु भी अपने दायित्व का निर्वहन करते हुये प्रतिबद्ध हैं।इस संग्रह में कुल 30 रचनाकारों की पर्यावरण आधारित 36 साहित्यिक रचनाएं इस विशेषांक की खूबसूरती को बढ़ाती हैं।आस है यह अंक आपको पसंद आयेगा।सुझाव एवं सहयोग की अभिलाषी ..डॉ.पूर्णिमा राय
रचनाकार एवं रचनाएं—
1)डॉ.सुरेन्द्र वर्मा—पर्यावरण और उसके प्रति हमारा बरताव(आलेख)
2)राज कुमार —-मेरा भारत: वातावरण संरक्षक (आलेख)
3) डॉ भोज कुमार मुखी——ई बुक्स (कविता)
4) डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा—माहिया छंद
5)शिव डोयले —– चुम्बन देता आषाढ़ (गीत)
6)डॉ .भावना तिवारी—पेड़ बहस नहीं करते(कविता)
7)डॉ. हरिभजन प्रियदर्शी— कुदरत का एहसान (कविता)
8)डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर—-फिर भी करें अधर्म (दोहे)
9)नीरजा मेहता ‘कमलिनी’—सुरक्षित पर्यावरण”(कविता)
10) प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”—- मेरा सुंदर गाँव (गीत)
11)संगीता पाठक —वृक्ष की पुकार(कविता)
12) डाॅ सुषमा गुप्ता — अबके बरस ( कविता)
13) अँजना बाजपेई—ये पेड़ ये पौधे (कविता)
14) शशि देवली—-जागो! पेड़ न काटो(गीतिका)
15)कामिनी गुप्ता —-गीतिका
16)पुष्प लता शर्मा–मुक्तक,सुंदरी सवैया
17)रजनी रामदेव —अभिलाषा
18)दीपिका कुमारी दीप्ति—अब मान भी जा प्रकृति (कविता)
19)अनिता मिश्रा—वृक्ष बचाएंं हरियाली लाए (कविता)
20)राजकुमार सोनी —गीतिका
21) राजन —दोहे
22)शोभित तिवारी “शोभित”–दोहे
23) कुमार गौरव —जाने कहाँ गए वो दिन!(कविता)
24)आशीष पाण्डेय जिद्दी—-दोहे
25)अनीला बत्रा—जल विसर्जन (लघु कथा)
26)मधु छाबडा ‘महक’— दोहे
27)अर्पणा संत सिंह—विध्वंसक नही संरक्षक बन
28)गिरीश पंकज –दोहे,गीत,लघुकथा
29) प्रमोद भंडारी “पार्थ –माटी गाती है (गीत)
30)डॉ.पूर्णिमा राय–दोहे,मनहरण घनाक्षरी,मुक्तक रचना
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1)  डॉ. सुरेन्द्र वर्मा , १०,एच आई जी , १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१  (मो. ९६२१२२२७७८)  
       
पर्यावरण और उसके प्रति हमारा बरताव
 पर्यावरण, वातावरण, वायुमंडल आदि, एक ही परिवेश के शब्द हैं और इनका प्रयोग एक दूसरे के लिए हम लगभग सामान अर्थ में करते रहते हैं | हमारे पर्यावरण में न केवल भौतिक वातावरण और वायुमंडल सम्मिलित है बल्कि हमारा सांस्कृतिक परिवेश भी इसमें निहित है | मुख्य रूप से जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो हमारा आशय देशकाल, तापमान, प्रकाश और अन्धकार की स्थितियां, गुरुत्वाकर्षण आदि, से होता है | भारतीय मनीषा ने हमारे पर्यावरण को पांच तत्वों से निर्मित माना है | ये हैं – जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश | इन्हें पञ्च-भूत कहा गया है |
    जल बहुत महत्वपूर्ण है | मीठा जल हमें वर्षा से मिलता है | वर्षा काल में यदि अतिवृष्टि अथवा अनावृष्टि होती है तो ये दोनों ही स्थितियां हमारे लिए चुनौती बन जाती हैं | वर्षा के पानी का सम्यक् संग्रह और उसका सम्यक् उपयोग करना हमारे लिए ज़रूरी है | पीने योग्य पानी की उपलब्धता बनाए रखना भी बहुत आवश्यक है और साथ ही उसे स्वच्छ रखना भी | आज हमारे जलाशय सूखते जा रहे हैं, धरती का पानी बहुत नीचे चला गया है | इसका कारण पानी का अत्यधिक उपयोग, उसके संरक्षण के प्रति उदासीनता, और उसकी बर्बादी है | कहते हैं कि यदि कभी भविष्य में कोई विश्व-युद्ध हुआ तो वह पानी को लेकर होगा | अत: हमें अभी से इस और सचेत हो जाना चाहिए और पानी के संरक्षण की तरफ अपना ध्यान केन्द्रित कर देना चाहिए | पानी के बिना तो जीवन ही संभव नहीं है | जल ही जीवन है | 
     मनुष्य के लिए अग्नि भी एक आवश्यक आवश्यकता है | हम अग्नि का प्रयोग प्रकाश के लिए करते हैं, ऊर्जा प्राप्त करने के लिए करते हैं, तापमान को संतुलित रखने के लिए करते हैं, खाद्य पदार्थों को पकाने के लिए करते हैं, इत्यादि | पैट्रोल, डीज़ल सौर ऊर्जा, गैस, बिजली आदि, का इस्तेमाल करते हैं | किन्तु ऊर्जा का गलत उपयोग अनेक समस्याएं पैदा कर सकता है | आज हम वैश्विक ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) की चपेट में आ गए हैं | पृथ्वी का तापमान दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है | ज्वालामुखी फट रहे हैं | इन सबका कारण ऊर्जा का असंतुलित और अविवेकपूर्ण इस्तेमाल ही तो है ! 
    शुद्ध वायु के अभाव में भी मनुष्य जी नहीं सकता | लेकिन आज इसकी अत्यंत कमी होती जा रही है | आकाश में ज़हरीली गैस की परत बन गई है | ओज़ोन की परत में एक बड़ा छिद्र बन रहा है | अगर वायु में  प्रदूषित गैस का नियंत्रण नहीं किया गया तो प्राण-वायु के अभाव में धरती पर जीवन ही खतरे में पड़ जाएगा | एक स्वस्थ पर्यावरण के लिए यह आवश्यक है कि हम वायु प्रदूषण से अपने परिवेश को बचा कर रखें | 
    पृथ्वी के महत्त्व को भी कम नहीं आंका जा सकता | पृथ्वी है तो खेत और खलियान हैं, पेड़ और पौधे हैं | पृथ्वी है तो तरह तरह के जीव-जंतुओं का विचरण है | वन और उपवन हैं | घर और इमारतें हैं | पृथ्वी आधार- भूत है | लेकिन आज पृथ्वी पर इतना अत्याचार हो रहा है कि वह अपनी धुरी से खिसकने लगी है | सुनामी जैसे तूफ़ान उसे अपने आगोश में लेने के लिए उद्यत दिखाई दे रहे हैं | समस्त पृथ्वी में जल-प्लावन जैसी स्थितियां निर्मित हो रही हैं |  इसका मूल कारण स्वयं मनुष्य ही है | जंगलों को निरंतर काट कर और वृक्षों को समाप्त कर हम पृथ्वी की छाती पर इमारतों का बोझ बढ़ा रहे हैं | पृथ्वी को हमने अन्दर से खोखला करने का मानों व्रत उठा रखा है | 
     यही हाल आकाश और अंतरिक्ष का भी है | आकाश पर विजय पाकर और पृथ्वी को चुनौती देकर हम बेशक अंतरिक्ष तक पहुँच तो गए हैं लेकिन जिस तरह हम अंतरिक्ष पर विजय प्राप्त करने की कोशिश करते जा रहे हैं। हमारी पृथ्वी और उसके प्राणियों पर खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं |    
     हमारा वायुमंडल बहुत कुछ मौसम पर निर्भर करता है | गरमी, बरसात और जाड़ा – एक निश्चित क्रम से आते हैं जिसे हम ऋतु-चक्र कहते हैं | यह ऋतु-चक्र अब काफी गड़बड़ा गया है | वर्षा के दिनों में जैसा पानी बरसना चाहिए, नहीं बरसता | गर्मियों में मौसम के प्रतिकूल अक्सर बारिश होने लगती है | जाड़ा कभी निर्धारित समय से पहले ही पड़ना आरम्भ हो जाता है तो कभी बाद तक कायम रहता है | इसके पीछे भी मनुष्य की प्रकृति के साथ नाजायज़ छेड़छाड़ ही मुख्य कारण है | 
     पर्यावरण के साथ मनुष्य कई तरह से बर्ताव करता है | कभी उसे दुश्मन समझकर उससे लड़ता है, कभी दोस्ताना भाव से उसका साथ देता है | कभी उससे अपनी रक्षा करता है तो कभी पर्यावरण की रक्षा के लिए भी वह अपने प्रयत्नशील रहता है | एक शब्द में कहें तो मनुष्य अपने परिवेश से “समायोजन” करता है | इस समायोजन के चलते पर्यावरण और मनुष्य दोनों में बदलाव देखा जा सकता है | इस दोतरफा प्रक्रिया को हम निम्न प्रकार से सूत्र-बद्ध कर सकते हैं –
    “प – म – प” 
    (पर्यावरण – मनुष्य – पर्यावरण)
एक शब्द में पर्यावरण मनुष्य पर और मनुष्य पर्यावरण पर अपना प्रभाव डालता है |
    पर्यावरण के प्रति हमारा बरताव कैसा है यह बहुत कुछ हमारे संस्कारों और संस्कृति पर निर्भर करता है | आज हमारे समाज में आक्रामकता अधिक हो गई है | हम स्वाग्रही और आत्म-केन्द्रित हो गए हैं | सहनशीलता की कमी के कारण हम अपने परिवेश के प्रति हिंसक होते जा रहे हैं | अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए हमारा समाज नैतिकता की परवाह न कर पर्यावरण का शोषण करने से बाज़ नहीं आता | अपने हित के लिए हम अपने पर्यावरण का केवल सम्यक् उपयोग ही नहीं करते, उसका अधिक से अधिक दोहन करते हैं | खतरनाक स्थितियों पर क़ाबू पाने के लिए, उन्हें कुचलने हेतु हम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चले जाने से भी हिचकते नहीं | पर्यावरण के विरुद्ध अपने प्रतिरोध को अभिव्यक्त करते हैं | आज केवल पाश्चात्य सभ्यता ही नहीं हमारी अपनी संस्कृति भी अपने पर्यावरण के साथ इसी प्रकार का बरताव कर रही है | प्रोद्योगिक अनुसंधानों का लाभ लेकर हम प्राकृतिक पर्यावरण को न केवल प्रदूषित कर रहे हैं बल्कि पर्यावरण के संतुलन को भी बिगाड़ रहे हैं |
    गांधी जी ने एक बार कहा था कि प्रकृति हमारी वैध ज़रूरतों (नीड्स) को तो पूरा करने में सक्षम है किन्तु वह हमारी लिप्सा और लालच (ग्रीड्स) को संतुष्ट नहीं कर सकती | पर्यावरण से अधिक से अधिक लाभ उठाने के उपक्रम में हम अपने पर्यावरण को ही नष्ट करते चले जा रहे हैं | हम भूलते जा रहे हैं कि हम भी तो अपने पर्यावरण के एक अंग हैं और यदि पर्यावरण अपने नियमों को तोड़ता है तो उसका शिकार मनुष्य भी होता है | आज यही स्थिति आ गई है | हम बजाए इसके कि अपने पर्यावरण के अनुसार उसके भागीदार बने हम उसके नियमों को बलपूर्वक तोड़ने में जुटे हैं | इसी का परिणाम हैं कि सुनामी जैसे तूफ़ान हमें झेलने पड़ रहे हैं और हमारे रक्षा-कवच, ओज़ोन, में छिद्र हो गया है | ऊर्जा प्राप्ति के साधन सीमित होते जा रहे हैं | यह प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध लूट का ही परिणाम है | 
     समय आ गया है कि हम सचेत हो जाएं और पर्यावरण के प्रति अधिक सहिष्णुता और जागरूकता बरतें अन्यथा मानव जाति के अस्तित्व का ही संकट झेलना पड़ सकता है | हमारे ऋषि-मुनियों ने इसी कारण अपने सम्पूर्ण पर्यावरण में शान्ति बनाए रखने के लिए कामना की थी | मैं फिलहाल इसी शान्ति-पाठ से अपनी लेखनी को विराम देता हूँ  —
द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष शान्ति 
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति |
शान्तिर्ब्रह्म शान्ति सर्वे शान्ति: 
शान्तिरेव शान्ति: सामा शान्तिरेधि: ||
             (यजुर्वेद, ३६/२४)
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2)राज कुमार (शिक्षक)                         
गृह पता-  214,डायमंड एविनयु,मजीठा रोड,अमृतसर
9592968886
मेरा भारत: वातावरण ( संरक्षक आलेख)
 हमारी धरती के कुल 4 मंडल हैं—
1.जल मंडल 2.थल मंडल 3.वायु मंडल 4.जीव मंडल…
औधोगिक क्रांति के पश्चात लगातार भौतिक जगत आगे ही आगे बढ़ता गया और मशीनीकरण की आड़ में केवल प्रकृति को ही नही बल्कि इंसानो को भी मसलता गया । बात अगर वातावरण की करें तो इंसान ने बेतहाशा जंगलों को कत्ल किया…कई जीवों को प्रजातियां समाप्त कर दी..पहाड़ों के नामोनिशां मिटा दिया और दरियाओं और समन्दरों को प्रदूषित कर दिया ।आखिर क्या जरूरत थी यह सब करने की ? ये हवस कुछ प्रतिशत लोगों की ही थी..धीरे धीरे यह प्रतिशत बढ़ता गया और आज हम ऐसे मकाम पर खड़े है कि खुद ही के होने वाले हश्र से ख़ौफ़ज़दा हैं ।भूचाल,सुनामियां, भूस्खलन ,नई- नई बीमारियां और ग्लोबल वार्मिंग जैसे खतरे सर पर मंडराने लगे है । इस बात का खतरा आज से लगभग 45 साल पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस किया था और विश्व-पर्यावरण को बचाने की आवाज उठाई थी।इस सिलसिले में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में 1972 में विश्व पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक विश्वस्तरीय समागम करवाया था,जिसमेंं 119 देशों ने हिस्सा लिया था ।श्रीमती गांधी ने इस समागम में भारत की ओर से प्रभावशाली विचार प्रस्तुत किए थे और खुल कर इस कदम का समर्थन किया था ।इसी समागम में U N E P (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परियोजना संघ)की स्थापना भी हुई थी और इसी समागम मे 5 जून को विश्व-पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय भी लिया गया था ।
     हमारी पुरातन वैदिक संस्कृति वातावरण के प्रति इतनी जागृत और वैज्ञानिक थी कि हजारों साल पहले हमने इसका सम्मान भी किया और संरक्षण भी….आइए जरा एक नज़र गौर फरमाएं….
1.ऋग्वेद का पहला मन्त्र अग्नि यां सूरज की स्तुति में कहा गया है और अर्थववेद में जलस्रोतों को शुभ,मंगल तथा अति कल्याणकारी बताया गया है और इनके पास निवास को अति उत्तम कहा गया है ।यह बात इस बात को साबित करती है कि हमारे दिल में प्रकृतिर के प्रमुख स्रोतों का पूजातुल्य स्थान रहा है ।
2.हमारे ऋषि मुनि दरअसल उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे लेकिन वो प्रकृति के प्रेमी और इसके संरक्षण के प्रति अति जागरूक थे ।इसीलिए उन्होंने नदियों और दरियाओं का पूजन खुद भी किया और इसे एक परम्परा का रूप भी दिया जो कि आज तक कायम है..भारत में केवल गंगा ही नही  यमुना,कृष्णा,कावेरीऔर ताप्ती आदि नदियों का पूजन आज भी होता है और बाकायदा इन्हें मां का दर्जा दिया गया है ।
3 . इस देश ने हिमालय को देवभूमि,कैलाश को महादेव का निवास और विंध्य परबत को महाशक्तियों के निवास बताया है।
गोवर्धन परबत पे ब्रजवासियों के लिए कई जड़ी-बूटियां और लाभदायक वनस्पति पैदा होने के कारण भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पूजा का आयोजन आरम्भ करवाया था ।
मुझे याद आते है फ़िल्म पूरब और पश्चिम के उस सदाबहार गीत के वो बोल जो इंदीवर जी ने अपनी कलम से लिखे थे कि…..
 इतनी ममता ,नदियों को भी
यहाँ माता कह के बुलाते है
इतना आदर इंसान तो क्या
पत्थर भी पूजे जाते हैं…
4 . यह वह देश है जिसने जीवोंं की पूजा की है..शेर की,हाथी की,चूहे की,मोर की,कुत्ते की,बैल की,गाएं की और नाग की…ये सब परम्पराएं उन विचारशील लोगों ने कायम की थी जिन्हें पता था कि केवल इंसान ही नही सभी जीव एक खास महत्व रखते है..हमारे गर्न्थो में इंसान के 10 पुत्रों के बराबर एक पेड़ की तुलना की गई है ।गाएं को जो इतना महत्व दिया गया उसका वैज्ञानिक कारण सभी जानते है..नाग या सर्प का विष कई जीवनदायी औषधियों में प्रयोग होता है ।हमारी परंपरा में पहली रोटी गाएं और आखिरी रोटी कुत्ते के नाम की निकाली जाती है.. हम उस परम्परा के लोग हैं जो चिड़ियों और मछलियों को आटा तथा पंछियों के लिए दाना और पानी छत की मुंडेर पे रखते है ,जो कि प्रकृति के जीवों के प्रति हमारे मन में बसे सम्मान का प्रतीक है 5 . हमारी परम्पराओं ने पीपल को देवता मानकर पूजा है और तुलसी को घर के आंगन की देवी समझकर पूजा है…कारण यह कि पीपल सर्वाधिक ऑक्सीजन देता है और तुलसी ऑक्सीजन के साथ साथ कई बीमारियों के प्रकोप से बचाती है ।यह वो देश है जहां वट पूर्णिमा और आंवला नवमी के त्योहार मनाया जाता है जो कि वनस्पति जगत के प्रति हमारी जागरूकता और सम्मान को प्रकट करता है ।
6 . हमारी पुरातन रीतियाँ हज़ारों सालों से ब्रह्मण्ड,सूरज ,चन्द्र और ग्रहों का पूजन करती आ रही हैं..हमारे वेदों और उपनिषदों में बाकायदा इनके नाम के मंत्र इसका पुख्ता सबूत है..कोणार्क का सूर्यमन्दिर और सोमनाथ का मंदिर इसके जीते जागते सबूत है ।
7 . अशोक और विक्रमादित्य ने जंगलों की रक्षा और जीवो के संरक्षण के लिए कदम उठाए थे..चाणक्य ने तो आरण्यपालकों की नियुक्ति का सुझाव भी दिया है ।..हमारी पुरातन संस्कृति बनस्पति जगत को शुरू से ही जीवंत मानती रही है और इनको एक योनि के रूप में स्वीकार करती रही है…भारत के गांव की अनपढ़ मां भी अपने बच्चे को रात के वक्त पेड़ पौधों को शुरू से ही स्पर्श करने से रोकती रही है क्योंकि परम्परा ने उसे सिखाया है कि इनमें प्राण हैं ।इसके अलावा गांव के लोग रात को पेड़ों के नीचे नही सोते,क्योंकि रात को ये कार्बनडाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं ।
8 . हमारे तीज-त्योहार अधिकतर मौसमोंं और प्रकृति की क्रिया के महत्व से मेल खाते है..महाशिवरात्रि,दीवाली,ओणम, वैशाखी ,दुर्गापूजा ,वसन्त पंचमी,मकर सक्रांति इतियादि त्योहार प्रकृति की पूजा करने का संकेत देते हैं ।
9 .हमारे ऋषि मुनि इस बात से भली प्रकार से परिचित थे कि जंगल इंसानी जाति के कल्याण के प्रतीक है..अतः उन्होंने अधिकतर अपने आश्रम जंगलों के पास प्रकृति के अधिकतर करीब वातावरण में बनाए और कई लाजवाब अविष्कार किए.. हमारे आरण्यक ग्रन्थ इस बात के सबूत है कि इनकी रचना अरण्यों या जंगलों में हुई थी..गुरुकुल भी अधिकतर जंगलों के पद शांत वातावरण में मौजूद होते थे ।
10 . हमारे 4 आश्रमों में से तीन आश्रम ब्रह्मचर्य,वानप्रस्थ और सन्यास का सीधा सम्बन्ध वनों से है ।
    दोस्तो उपरोक्त कुछ बातें हमारी पुरातन संस्कृति की वातावरण के प्रति जागरूकता और संरक्षण को साबित करती है ।दरअसल पुरातन युग से ही हमारी वैदिक संस्कृति की इस धारणा से विश्व परिचित है  कि “जीओ और जीने दो”…अतः हमने केवल मानव जाति का ही नही जीव जगत,वनस्पति जगत और प्रकृति के हर रूप का शुरू से ही सम्मान किया है …एक बात याद रहे कि ..सम्मान सदैव संरक्षण को अपने आप जन्म दे देता है । हम विश्व की दूसरी कौमों से प्रकृति के संरक्षण और सम्मान के प्रति शुरू से अधिक जागरूक और सभ्य हैं…लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज हम 1.3 अरब की बड़ी भीड़ इस भारतभूमि पे खड़ी कर चुके है और हमारा रकबा 3287263 sqare वर्ग किलोमीटर है ,जबकि जनसंख्या में हमसे कुछ ही दूरी पे आगे चल रहे चीन के पास 9.5sqare वर्ग किलोमीटर रकबा है जो कि हमसे तीन गुना ज्यादा है….
     इतनी इक्कठी हुई भीड़ के अंदर से संवेदनशीलता समाप्त हो रही है.. लोग ज़ेहनी तौर पे बीमार हो रहे हैं…स्वयं को संभाल पाने में असमर्थ हो रहे है…हमेंं यह नही भूलना चाहिए कि अच्छी सभ्यता और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पे तन्दरुस्त होना बेहद जरूरी है अतः हमें भारत के वातावरण की रक्षा करने से पहले अपने, अपने परिवार ,गली-मोहल्लों और गाँव-नगरों का वातावरण शुद्ध करना होगा…तभी ऐसे दिवस कामयाब होंगे ।
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3)डॉ भोज कुमार मुखी
सम्पर्क :- 584 , डी डी ए, फ्लैट्स , मेट्रोव्यू अपार्टमेन्ट , सेक्टर 13 -B , द्वारका 
नई दिल्ली ..110078
मोब : 7011099253
ईमेल: mukhidr@yahoo.co.in

ई बुक्स (कविता)

पिछले कुछ दिनों से मूड बिगड़ा हुआ था …..रात को नींद ठीक से नहीं आती थी . ..कमबख्त भाव भी मेरे चुने शब्दों में ढलने को तैयार नहीं थे..

रोज हाथापाई होती थी ……….वो अपनी मन मर्जी के शब्द वस्त्र पहनना 
चाहते थे…… 
” कमरे से बाहर निकलो 
सेक्टर 13 वाले पार्क में चलो…
हाँ पेन और डायरी न लो 
अपने मोब पर सीधे ही लिख लो जो लिखना हो ” 
मैं एक पेड़ के नीचे आ बैठा
पेड़ की डालियाँ नीचे झुकी हुई थीं..
पक्षियों के झुण्ड के झुण्ड पेड़ के पत्तों में आराम फरमा रहे थे
वहां बैठे लोग कह रहे थे 
यहाँ टॉयलेट बनाने है 
अभी कड़कती धूप है आँखें बाहर निकल रही हैं..
शाम को इसका सर कलाम करेंगे 
……………….
मैं अभी लिखने की सोच ही रहा था ….किसी के सिसकने की आवाज आई
कोई दुसक रहा है .. 
……………………………………………
पक्षियों का कलरव दुःख के सागर में डूबा था …
कल कहाँ जायेंगे ? पीढ़ी दर पीढ़ी यहाँ रहे हैं.
…………………………………………
दुसकने की आवाज कुछ बढ़ गयी 
पेड़ से कान लगाने पर लगा पेड़ रो रहा है
……………………………………….
दुःख भरे शब्दों में रुंधी हुई आवाज आई 
” आप तो लेखक हैं समाज का संवेदनशील वर्ग…
सबके दुखों दर्दों को समझने वाला ..
आप मेरे दुखों को समझते क्यों नहीं ?
मुझे मारा जाएगा….
जलाया जाएगा ….. कागज बनाया जाएगा 
आप जैसे संवेदन शील लेखकों की किताबें छपेंगी 
यहाँ हर कोई स्वार्थी है मतलबी है..
प्रसिद्धि पाना चाहता है …कालजयी रचनाओं से 
किताबों में अमर होना चाहता है ..
डिजीटलाईजेशन का जमाना है …..
ईबुक्स स्वीकारो,हमें बचाओ

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4)डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
जन्म स्थान  : बिजनौर (उ0प्र0)
हिल्स ,छरवाडा रोड , वापी , जिला- वलसाड , गुजरात (भारत )
माहिया
मीठा सा गीत दिया
जल ,पंछी ,झरने
कल-कल संगीत दिया ।
नदिया को बहने दो 
धरती का आँचल 
धानी ही रहने दो । 
गौरव का गान करें 
उच्च शिखर धौले
खुद पर अभिमान करें ।
काँपा कुछ बोल गया 
आज पहाड़ों का 
धीरज भी डोल गया । 
कैसा यह बादल है 
रूठी है बरखा 
धूँएँ का काजल है ।
कचरे से भर डाला 
अमृत से जल को 
क्यों विषमय कर डाला । 
दिन जैसे रैन हुआ
क्या लाई नदिया
सागर बेचैन हुआ ।
 
अब क़दर नहीं जानी 
कल फिर पीने को 
दो बूँद नहीं पानी । 
वो भी तोड़े वादा 
जो तुमने तोड़ी 
मौसम की मर्यादा । 
पेड़ों के तन आरी
फल तुम पाओगे 
बदले में दुख भारी । 
पी है कैसी हाला 
मधुर फलों को भी
क्यों विष से भर डाला ।
सोचो ,तब काम करो 
केवल ‘पिकनिक’ से
मत तीरथ धाम करो । 
झरने का नाद सुनो 
मौन रहो मन से 
कोई संवाद बुनो । 
नदिया की स्वर लहरी 
सींच रही जीवन 
कब पल भर को ठहरी । 
थोड़ा तो मान करो 
सहज सहेजो धन 
सुख का संधान करो । 
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5)  शिव डोयले,सेवानिवृत्त
झूलेलाल कॅालोनी हरीपुरा,विदिशा 464001 
 ( म०प्र०)
मोबा०  09685444352
 चुम्बन देता आषाढ़ (गीत)
स्मृति की नन्ही बूंद
गिरी होगी गाल पर ।
तब लिखा होगा गीत
बरसाती रूमाल पर ।
       उम्र यौवन की मिली
       उन्मत्त इतरा  रहे  ।
       सम्बोधन मेघ से
       यत्र-तत्र मंडरा रहे  ।
सहज है चौंक जाना
पपीहा बोले डाल पर ।
        कल्पना-जल में डूबे
        आज विरह के पहाड़।
        अवनी के अधरों को
         चुम्बन देता  आषाढ़
विद्युत सा हस्ताक्षर
करता समय ख्याल पर ।
           मन के अंधियारे पर
           सुधियाँ चमक-२ जाती।
           धड़कन सीमा से  परे
           बढ़ सुध-बुध भुलाती  ।
प्रतीक्षारत रही घड़ी
टिक-टिक करती दीवाल पर।
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6)डॉ .भावना तिवारी 
9935318378
 drbhavanatiwari@gmail.com
पेड़ बहस नहीं करते
————–
न नुकुर नहीं करते
परिसम्वाद भी नहीं
विरोध स्वभाव नहीं इनका
 खिलते हैं, बढ़ते हैं
होते हैं हरे
फ़लों से भरे
 नाचते हैं, झूमते हैं
चूमते हैं हवा
झुलाते हैं झूला 
 हो जाते हैं निर्वसन
टूटन करते हैं मंज़ूर
पर उफ़्फ़ रे आदमी
तुझे नहीं आया शऊर 
 काटता , बाँटता, जलाता
फिर भी चैन न पाता
मिटा देता है तू समूल
न मानता अपनी भूल
 करते हैं स्वीकार 
अपमान, अत्याचार, 
सहते हैं चोटें
रे आदमी 
अपराध सिद्ध हुए बिन हर दंड
क्योंकि
पेड़ बहस नहीं करते।
*********************************
7)डॉ. हरिभजन प्रियदर्शी
                     प्रवक्ता -हिन्दी
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय( कन्या) 
मलोट,  श्री मुक्तसर साहिब पंजाब
 
            ***कुदरत का एहसान ***
कुदरत है अनमोल ,
कोई न दे सकता  मोल ।
हमारे जीवन की है रक्षक,
हमीं बन गये इसके भक्षक
स्वार्थवश मानव बन गया दानव
वनों के विनाश का है यह रावण 
कोठी कारखानों आवासों के खातिर,
जंगलों को खत्म कर रहा मानव शातिर।
 किसी अंग पर चोट लगे एक,
 पूरे तन में उठती पीर अनेक।
पर क्या, वृक्षों में जान नहीं होती ,
धड़ल्ले से जिन पर आरी चलती।
आँसू ये भी बहाते हैं,
 आँखों से नीर गिराते हैं।
मरते दम तक कुदरत हमें बचाती है ।
फिर मानव तुझको दया क्यों नहीं आती है
अपने रक्षक की रक्षा क्यों नहीं करते हो।
यथार्थ तो यह है——-
पहले प्रदूषण का कहर बरपाया ,
जब रोग ग्रस्त हुआ तो घबराया।
पीढ़ी को बचाने हेतु तिलमिलाया ,
पूरे विश्व से यह नारा लगवाया।
पर्यावरण को बचाना लक्ष्य होना चाहिये।
बच्चे-बच्चे को वृक्ष लगाना चाहिये
चिन्ता मत कर प्रियदर्शी ,
मानव है वही जो होता दूरदर्शी ।
****************************************************
8)- डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
सम्पर्क: 
24/18, राधा नगर, फतेहपुर (उ.प्र.)-212601
मोबाइल : 9839942005
ई-मेल : doctor_shailesh@rediffmail.com
डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ के दोहे
(फिर भी करें अधर्म)
—————-
1-
शून्य हुआ पर्यावरण, दूषित है परिवेश।
संत रमे रस-रंग में, बंद हुए उपदेश।।
2-
उनको वैसे फल मिले, जिनके जैसे कर्म।
प्रकृति विनाशक हो रही, फिर भी करें अधर्म।।
3-
नागफनी के शहर में, ढूँढ़ा करता नीम।
तपन-भरे परिवेश में, यादें आइसक्रीम।।
4-
सूखे पोखर-ताल हैं, पशु-पक्षी बेचैन।
ज़र्रा-ज़र्रा जानता, किसने लूटा चैन।।
5-
पानी-पानी कर रहे, पानी वाले लोग।
पैसों में पानी बिके, सस्ते छप्पन भोग।।
6-
जंगल-जंगल पुर बसे, गये सरोवर सुख।
तरह-तरह की व्याधियाँ, मिटी न मानव भूख।।
 *********************************
 
9)नीरजा मेहता ‘कमलिनी’
मोबाईल/ईमेल — 9871028128, 9654258770
“सुरक्षित पर्यावरण”(कविता)
करें उजागर जन-जन को हम
स्वच्छ सुनहरा कल बनायें
रहे न वंचित कोई अब
अन्न फूल फल साग उगायें।
अंदर बाहर हो सब पावन
स्वच्छता को आधार बनायें
क्या गृहण क्या त्याग है करना
सोच समझ कर ही अपनायें।
करें देश प्रदूषण मुक्त
चहुँ ओर हम वृक्ष उगायें
देश में स्वच्छ पवन लहराकर
धूल धुंए से इसे बचायें।
तालाब नदियाँ नाले कुँए 
कहीं भी कचरा न फैलायें
रक्षा करें हम पशु पक्षी की
सुरक्षित पर्यावरण बनायें।
अभी समय है करें न देरी
रोकें इसे न विष फैलायें
समझें इसे, ये कर्तव्य हमारा
जागरूक प्राणी कहलायें।
मिले हैं रंग, अन्न, फल सब्ज़ी में
क्यों खाकर अपनी जान गवांयें
शुद्ध भोजन है पूँजी अपनी
सुरक्षित खाद्य अभियान चलायें
हरा भरा हो देश हमारा
स्वच्छ शुद्ध पावन कहलाये
कुछ ऐसा कर गुज़रें हम सब
स्वर्ण चिरैया देश बनायें।
ये जीवन अनमोल हमारा
रोगों से हम इसे बचाएं
नौनिहाल सी भावी पीढ़ी
चेहरों पर मुस्कान खिलायें।
करें न देरी,  ले लें प्रण
मिलकर सब आवाज़ उठायें
आज नहीं, हाँ कभी नहीं
हम जीवन में ये विष अपनायें।
घर-घर में खुशहाली भर दें
जन-जन में नव चेतना लाएं
शुद्धता की पहचान हो भारत
सुरक्षित पर्यावरण  बनायें।
***************************************
10)प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”,नाथद्वारा
मेरा सुंदर गाँव (गीत)
कच्चा पथ पथरीली राहेँ सूनेपन का साया है 
देखो  मेरा गांव देखने शहर ये सारा आया है
ना रिक्शा ना घोड़ा गाड़ी आती जाती गांव में 
कच्ची पक्की संकरी सड़कें पहुंचाती हैं गांव में 
निर्मल गांव की इन गलियों नेमन सबका ललचाया है
देखो  मेरा गांव देखने शहर ये सारा आया है
घूम रहे हैं गाँव की बस्ती कच्ची पक्की ढ़ाणी में
जहाँकी बातेंकभी सूनीथी नानी दादी की कहानी में
आल्हादित हो गगन चूमती ये अरावली मतवाली 
हरे भरे पर्वत लगते जैसे बिछी हो सावन की हरियाली 
पेड़ों के झुरमुट से झांकती ये उषा की उजियाली 
ताल-तलैया चमके जैसे भरी हो चांदी की थाली
घने वृक्ष की लंबीकतारें  मद मस्ती में झूम रही 
प्रणय सूत्र में बंधी बंधी ये एक दूजे को चूम रही
कहीं खेत खलिहान की पाली कहीं पसरता धान है
बाग बगीचे खिलती कलियां फूलों की मुस्कान है
देख निराला निर्मल पन ये मन सबका हर्षाया है 
देखो  मेरा गांव देखने शहर ये सारा आया है
झरझर झरते निर्मल झरने झील  की सुंदर पाल है
सजी-धजी है बस्ती सारी चौराहे चौपाल हैं
कच्चे केलू के आंगन में प्रीत की पक्की बातें हैं
एक दूजे के सुख दुःख सारे मिलकर रीत निभाते हैं
मेहनतकश इंसान यहां पर रहते स्वाभिमान से 
सर्वधर्म सम्मान की बातें करते हैं सब शान से 
पुण्य धरा यह प्रीतम पथ की पावन मन का धाम है
यहां के जन जीवन के भीतर रमते सुन्दर श्याम है 
यह जन्नत के जैसी धरती  यहाँ स्वर्ग का साया  है
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11)संगीता पाठक ,एम.ए (हिन्दी) बड़ौत
           वृक्ष की पुकार (कविता)
जब तक जड़ – हृदय में,
     बेवफाई का बिषाद घुला न था
      मेरा पत्ता पत्ता हरा था 
      हर टहनी तना भरा था।
  पतझड सावन या बसंत बहार
     जो भी मौसम आता था,
      तेरी वफा के साथ सुख दुख,
       सभी हँस के सह जाता था
पलपल निहारना तेरा 
        मुझमें रंगत भरता था
         छू छू कर सहलाना तेरा 
          मेरे रोम रोम को कंपित करता था।
जितना तुमने दिया मुझे था
          सब्र उसी में मुझे था
          फिर कयूँ मुझसे छीन लिया
           जो कुदरत से मुझे मिला था
मानता हूँ मैने कभी 
             खुशबू दी न फूल
             पर मैने ऐसी भी तो
              की न कभी कोई भूल।
 जिसकी खातिर तूने मुझे
              तन मन से मिटा दिया
               स्व स्वार्थ की खातिर 
               मेरा सर्वस्व ही मिटा दिया।
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12)डाॅ सुषमा गुप्ता 
स्थाई पता:  327/सेक्टर 16A,फरीदाबाद  पिन 121002, हरियाणा 
ई मेल :   suumi@rediffmail.com
          अबके बरस ( कविता)
 अबके बरस जब 
पतझड़ आया …
और पेड़ों से पत्ते 
गिरते रहे झड़ते रहे 
तब पहली बार 
बूढ़े दरख्त की 
आँखें मुरझाई थी…
रोज सुबह कंक्रीट की 
सपाट सी सड़क पर
स्वीपर चाचा …
सारे पत्ते सहेज जाते 
एक कोने में ढेरी बना….
फिर सरपट सी गाड़ी
कूड़ा उठाने वाली आती
और समेट ले जाती ….
सारी उम्मीदें 
उस बूढ़े होते पेड़ की ।
नम आँखों से पेड़
देखता रहता 
मूक दर्शक सा
पर करता भी क्या ।
एक वक्त था पेड़ के 
आसपास की ज़मीन कच्ची थी….
न चबूतरा था बड़ा सा 
न दूर तक फैला 
कंक्रीट का जंगल
तब जब पत्ते झड़ते थे 
बूढ़े होते पेड़ के ……
तो खुशी से झूमता था वो
कि मिट्टी में मिल कर 
पानी से जी कर 
फिर ये पत्ते उसकी जड़ों में
पंहुच जाऐंगे ….
और फिर जन्म लेते थे 
पेड़ की डालियों पर 
हर्ष और उल्लास से भरे 
हरी हरी सी कोंपलें बन….
और फिर हो जाती थी
प्रकृति नव जीवन पर 
गर्व से उत्साहित …..
पर अब सब सूना है 
कहाँ बची है मिट्टी ?
जिस में ये सूखे पत्ते
सिमट कर लौट आए
पेड़ की शाखाओं पर …
अब तो बस कुछ 
बुजुर्गवार ले जाते है 
सूखे पत्तों को 
अपनी कांपती 
हथेलियों में दबा कर ….
शायद उन्हें बड़े 
अपने से लगते है वो…             
***************************************
               13)अंजना  बाजपेई
जगदलपुर (बस्तर ),छत्तीसगढ़..
ये पेड़ ये पौधे (कविता)
ये पेड़,ये पौधे,ये वन, ये उपवन 
हमको प्यार करते हैं
जीने के लिये हमें साँसे देते है ,
मिट्टी को जड़ों से पकड़कर,
 ये पानी बचाते है,हमको जीने का ये साधन देते हैं….
 मन की उदासी ये पल में हरते हैं,
 ये पेड़ ,ये पौधे हमसे बातें करते है,
पंछियों ,गिलहरियों को आश्रय देते हैं
 हमको प्रकृति का मधुर संगीत देते हैं,
धूप में जलकर हमें छाया देते है ,
हमको जीवन भर सहारा देते हैं…..
 फूल बनकर, हमारे लिये दुआयें करते हैं,
दवा बनते हैं, जीवन रक्षक बनते हैं ,
खुद कटकर, हमें जीवन का आधार देते हैं,
घाटी में हो या पहाड़ों में ,हर पल खुश रहते हैं ,
हमको खुशी से जीने का मंत्र देते हैं ,
जीवन भर हमारा, साथ देते है ,
ये पेड़, ये पौधे ,ये वन, ये उपवन
 हमसे प्यार करते हैं…
 हम क्यों न प्यार करें इनको, 
ये हमारे लिये जीते हैं ,
हम क्यूँ न लगाये वृक्ष और पौधे, 
ये हमको प्यार करते हैं ……
***************************************
14)शशि देवली ,शिक्षा विशारद
प्रकाशित पुस्तक – मुड़ के देखना कभी (एकल काव्य संग्रह )
 सम्पर्क – निकट गोपीनाथ मन्दिर
             मन्दिर मार्ग
गोपेश्वर चमोली उत्तराखंड 
मोबाइल नम्बर- 9997716536
          जागो_ पेड़ न काटो(गीतिका)
धरती ने ये रूप है बदला
मानव ने ये क्या आग लगाई
एक- एक कर काट डाला है
खुद अपनी विपदा है बुलाई।
अनमोल गहने थे धरती माँ के
अनमोल तन की हरियाली थी
सूखा बंजर कर दिया जमीन को
ये क्या मानव की मनमानी थी।
विध्वंस का कोहराम मचाया
पेड़ काटा और घर बनाया 
घर में जब खुशहाली ढूँढी
तो सुख का एक भी बीज न पाया।
उजाड़ घरौंदे दूजे के
क्या सुख भोग पायेगा वो
जो बोया था उसने आज
कल फसल वही तो काटेगा वो।
धरती सुनहरी जीवन सुनहरा
सुनहरी यादों का मेला है
मनुष्य ने जब भी जन्म लिया 
धरती माँ से खेला है।
कोख में उसकी पला बढ़ा 
और उस पर ही फिर प्रहार किया
उसकी पीड़ा समझा न कोई
उसने फिर भी प्यार न्यौछार दिया ।।
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15)कामिनी गुप्ता,जम्मू एम. एस. सी.( गणित)
गीतिका
लहलहाते से पेड़ थे, प्रकृति करती थी श्रंगार
आज की हालत देख, प्रकृति लगती लाचार।
कण कण को शिकायत है, धरा डगमगाती है
 मिट्टी में भी,  उपजाऊ पन की नहीं भरमार।
छोड़ो ऐसे काम को, जिससे संतुलन ही हिल जाए
पेड़ों को काटो कम, हरियाली का करो विस्तार।
न ठंडी छांव मिलेगी, न लेने को सांस बचेगी
मिलजुल कर सभी करो, इस धरा पर उपकार।
पर्यावरण से छेड़छाड़़, प्रकृति का असंतुलन
बंद करो यह काज,धरा पर लाओ बस निखार। 
***************************************
 
 16)पुष्प लता शर्मा, स्नातक (वाणिज्य )
प्रबंधक  (F&A)
स्थाई पता- -बी -602, एयरलाइनर्स ग्रुप हाऊसिंग सोसाइटी ,प्लाट नं -27 सेक्टर -10, द्वारका , नई दिल्ली-110075
मुक्तक
कभी पर्यावरण अपना , नहीं दूषित करेंगे हम 
अगर छेड़े इसे कोई, नहीं हरगिज़ सहेंगे हम 
सदा कोशिश करेंगे हम ,सुधा रस विश्व में बरसे
 प्रदूषण मुक्त हो धरती, यही संकल्प लेंगे हम 
सुंदरी सवैया
1)
वसुधा पर नीर अमोलक है,यह नीर अमोलक बन्धु बचाओ ।।
सबसे पहले यह काम करो,घर द्वार सभी गुलजार बनाओ ।।
नव वृक्ष लगाकर एक सभी,धरती पर पुष्प बसन्त खिलाओ ।।
मनु आप बनो अपनापन दो,नित प्रेम लुटाकर प्रेम बिछाओ ।।
2)
बढ़ती गरमी बरसात नहीं,(सगरे) *सहमी* चिड़िया जल खोज रही है ।।
कुछ मौसम मार रहा जग को,कुछ मानव की कटु देन यही है ।।
भगवान सुने किसकी किसकी,किसको कह दे वह पुष्प सही है ।।
सच तो इतना जग जाहिर है,सखि वारि बिना कल आज नही है ।।
3)
बन मानव नेक चलो धरती,पर कष्ट मिटा उद्धार करेंगे 
शुरुआत करें हम आज अभी,तब ही अपने वलिहार बचेंगे ।
खुशहाल रहे जनजीवन ये,नहिंं पेड़ कभी धर धार कटेंगे।
नव वृक्ष लगाकर ही जग में,सबके घर आँगन द्वार सजेंगे।
***************************************
 
17)रजनी रामदेव,न्यू दिल्ली
             अभिलाषा
धरा चाहती है 
ज़रा ज़रा मुस्कुराना प्रकृति सँग…..
वृक्षों से प्यार करें वातावरण रखें स्वच्छ 
तो रहे उमंग….
बचा लें इसे
इंसाँ के ज़ुल्मों सितम से बदल दें जीने का ढँग…….
सज कर वृक्षाभूषन
महकती रहेगी धरा भी
होकर मलँग……
रक्तिम ओष्ठ
देकर नवीन आभा 
कर देंगे दंग……
बहा शीतल समीर
चूनर ओढ़ सुनहरी
रहती स्वछन्द……
प्रेम ग़र प्रकृति से वृक्षों को काटे नहीं जलवायु हो तँग……
मेघों का आकर्षण
होते धरा के वृक्ष
बरखा प्रसङ्ग….
***************************************
18) दीपिका कुमारी दीप्ति
शिक्षा- बी.एससी. , बी. एड. , एम. ए. (हिन्दी)
पता- करहरा, पालीगंज, पटना ईमेल- dpkadeepti@gmail.com
अब मान भी जा प्रकृति (कविता)
ओ प्यारी प्रकृति बोलो
क्यों हो इतनी नाराज,
किस बात का गुस्सा है
जो उगल रही हो आग।
                         ये ग्लोबल वॉर्मिंग ने सब
                         बिगाड़ दिया है संतुलन,
                         कभी बाढ़, सूखा, सूनामी
                         तो कभी ये बेचैन पवन।
तड़प-तड़प कर मर रहे
पशु-पक्षी और मानव,
सभी हैं बेचैन यहाँ पर
चारोंं ओर फैला तांडव।
                                दूभर हो गया है अब तो
                                बाहर जाना एक कदम,
                                सहन नहीं होता ये ताप
                                ऐसे मत बनो बेरहम।
अपने स्वार्थ के लिए हमने
बिगाड़ी तेरी संपत्ति
फिर कभी नहीं दोहरायेंगे
अब मान जा ओ प्रकृति।
                    हम मिलकर वादा करते हैं
                     अपना हर फर्ज निभायेंगे,
                      शुद्ध रखेंगे ये पर्यावरण
                     बहुत पेड़-पौधे लगायेंगे।
***************************************
19)अनिता मिश्रा.हजारीबाग
वृक्ष बचाए हरियाली लाए 
देख मानव तेरी करनी का फल,
कहीं भूकम्प कहीं सूखा,
ईट,कंक्रीटकी बना दी धरती,
सारे धरा को काट डाला,
अपने लालच के कुल्हाडी से,
क्यूं अब पानीऔर हरियाली को तरसे!!
एक दिन एसा आयेगा,सांस -सांसको तरसेगा!!
वृक्ष ही ना होंगे तो हवा कैसे पायेगा l
जिस धरा ने जीवन रुपी वृक्ष दिया,
तूने तो उसका विनाश किया,
अपने जहर पीकर तुझेअमृत हवा दी,
उसे भी ना छोडा!!
तेरी घृणित इच्छा को अब ये साख भी समझते है,
ये अब ना माफ करेंगे,तू लाख मना ले इनको!!
भुगत अपनी करनी का फल,
देख अपनो की ही मौत ,अपने हाथोंं से की तुमने!!
धरती की नमी,हरियाली को तेरा भी मन तरसेगा!!
तब एयर-कंडीशनर मेंं बैठ कर नकली फूलोंं से दिल बहलाना!!
असली चीजोंं के लिये हर पल तू अब तसरेगा l
अब भी समय है चेतो मानव कम से कम ,
सभी मिल वृक्ष लगांये अपनी धरती को स्वर्ग बनाये l
अन्न-जल ,वर्षा सभी वृक्ष से ही होते,
पर्यावरण को हम बचाए l
वृक्ष और जंगल ना काटे ,और ना कटने दे l
यह नारा सभी मिल लगाये ll

***************************************

20)राजकुमार सोनी ,मसौली ,बाराबंकी
मो—--8090216365
                गीतिका
स्वच्छ वातावरण कीजिए,
             स्वस्थ पर्यावरण कीजिए।
खेत मेंं आग अपने लगायें नही।
राह मेंं कूड़ा कर्कट बहायें नही।
      साफ अपना सहन कीजिए।
           स्वस्थ पर्यावरण कीजए।
अब खुले मेंं कभी शौच जायेंनही।
शर्म को इस धरा से मिटायें नही।
बंद जल का क्षरण कीजिए।
             स्वस्थ पर्यावरण कीजिए।
प्लास्टिक यूज करना मुनासिब नही।
धूम्र आँगन मेंं भरना मुनासिब नही।
आज मिलकर प्रण कीजिए।
        स्वस्थ पर्यावरण कीजिए।
नाले नदियों मेंं अब हम गिरायें नही।
फूल फल भी नदी मेंं बहायें नही।
राज सुन्दर चमन कीजिए।
           स्वस्थ पर्यावरण कीजिए।
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21)राजन ,शिक्षक
एम.ए (हिंदी,अंग्रेजी, इतिहास,बी.एड)
मो—9501003567
                       दोहे
पर्यावरण जन्म दिवस, सभी मनाएं आज। 
इससे ही तो होत है, जीवन का हर साज।। 
पेड़ लगाओ रोज़ इक, तभी बनेगी बात। 
फल मिलें प्रसून खिलें ,होती है बरसात।।
पेड़ों के बिन मेघ के,लगते बुरे मिजाज
हुआ खेत में कृषक के ,आँसू का आगाज़।। 
पेड़ पेड़ सब जन करें, पेड़ लगाय न कोय। 
नित दिन ही बस काटि रहि, हर पल इनको खोय।। 
विश्व पर्यावरण दिवस, हमें नहि है सुहाय। 
त्राहि बोल तरु रो पड़ा, भीषण रूप दिखाय।।
       
*******************************
22)शोभित तिवारी “शोभित
पता — जिला लखीमपुर खीरी
तहसील धौरहरा 
दूरभाष–7800961090
शिक्षा –स्नातक
                  दोहे
 
सही नही पर्यावरण,भारत मेंं अब आज ।
जंगल कटते जा रहे,लोग न आते बाज ।।
नही बढ़ानी है अगर, जनमानस की पीर।
शुद्ध करें पर्यावरण ,शुद्ध करें हम नीर।
 
वृक्षों का रोपण करो , तभी बने संसार।
सही रहे पर्यावरण ,इसका करो विचार।
 
प्रकृति हमारी मित्र है,रहो सदा अनुरूप ।
सही समय पर मिल सके ,सर्दी-वर्षा-धूप ।।
 
धरती का पर्यावरण,जीवन का आधार।
इसको मत समझो कभी ,तुम अपना आहार।
 
आओ अब संकल्प लें, मिल करके
हम लोग ।
बना रहेगा संतुलन, मिट जाएंगे रोग ।।

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23)कुमार गौरव ‘पागल’
पिता:- स्व. जगदीश प्रसाद सिंह
जन्म तिथि:- 07/12/1992
शैक्षणिक योग्यता:- इंटरमीडिएट
पता:- बारीडीह बस्ती, जमशेदपुर, झारखण्ड- 831017। संपर्क:- 9955362825
जाने कहाँ गए वो दिन!(कविता)
जाने कहाँ गए वो दिन…
जब झूम कर बदरी बरसती थी,
धूप घनेरी, शाम सुनहरी
 ठंडी हवा पेड़ों से मिलती थी।
चिड़ियों का रैन बसेरा था 
सुगंध हवाओं में बिखर जाती थी ।  
मनोरम दृश्य आँखों में कैद किये  
कोयल भी कोई नग़मा सुनाती थी ।
स्वच्छ, निर्मल , धवल सी नदिया 
कल – कल मलहार सुनाती थी ।
पुरवइया रूह जब छू जाये 
प्रेम की अगन बढ़ाती थी।
दूर खड़ा पर्वत विशाल 
हरियाली ओढ़े रहता था,
अपने कठोर सीने में वह
फूल खिलाये रहता था।
स्वार्थ में देखो मानव नेंं 
क्या से क्या यह कर डाला ।
इमारत निर्माण की होड़ में 
वृक्षों को साफ कर डाला ।
वो स्वच्छ हवा जो बहती थी 
उसमें जहर भर डाला ।
जीने की चाह में मानव ने 
जीवन को खत्म कर डाला ।
प्रदूषित वायु का हो भारीपन 
विकृत हो जाता है तन-मन 
तब मानव कह उठता है
जाने कहाँ गये वो दिन ।
जाने कहाँ गए वो दिन
***************************************
 24)आशीष पाण्डेय जिद्दी 
पेशा- वनरक्षक, वनविभाग( मध्यप्रदेश ,पन्ना जिला)
पता-ग्राम पोस्ट अंतरैला (12),थाना चाकघाट तहसील त्योंथर जिला रीवा मध्यप्रदेश 
       
                  दोहे
आँसू आए आँख में, देख प्रकृति का हाल।  
जंगल मिटते देखकर, हर प्राणी बेहाल। 
हवा नहीं हैं शुद्ध अब, पानी बिकता देख। 
भाग्यविधाता का नहीं, खुद मानव का लेख। 
अंबर से बरसे अगन, बादल सारे खोय। 
अब धरती को ताप में , कैसे साहस होय। 
जल बिन सूना ताल है, तरुवर सूखे जात।
तृष्णा में धरती जले, जीवन की है मात। 
खग नभचर जलचर सभी, दर दर ढूढें नीर। 
प्यास से बढ़कर है नहीं, प्राणी कोई पीर। 
जल संचय करने लगो, वन से जीवन जान। 
बादल बारिश वायु सब, वन का हैं वरदान। 
 ****************************************   
 
25)अनीला बत्रा हिंदी मिस्ट्रैस।
जालंधर
            जल विसर्जन (लघु कथा)
मन अत्यंत शोकाकुल था। मैं दादी का प्राण था। हमेशा कहती थी,”मनु..तू मेरा राजा बेटा है ना। तेरे पिता को तो अपनी माँ की तनिक भी परवाह नहीं है। कह कह कर थक गई हूं,पर उसके पास समय ही नहीं कि मुझे गंगा स्नान करवा दे। ऐसे ही मर जाऊंगी।”
आज जब हरिद्वार की पावन धरा पर दादी की अस्थियां लेकर आया तो पिता जी भी अपनी अश्रु धारा को रोक न पाए। कल कल करती भागीरथी भी मानो दादी से मिलने को उतावली थी। अस्थि कलश से उन्हें अंतिम बार विदा करते हुए बार बार उनका चेहरा सामने आ रहा था। पर यह क्या,न जाने क्यों ऐसा लगा मानो दादी की आत्मा मुझे करुण नेत्रों से तकने लगी। गंगा के जल में लिपटी गंदगी और कूड़े से स्वयं को बचाता दादी का अस्थि कलश कुछ अनकहे सवालों के जवाब मांग रहा था। अपने संस्कारों की रक्षा करने के प्रयास में मैं जल विसर्जन हेतु आगे तो बढ़ रहा था परंतु कहीं मन में क्षोभ भी था कि मैं जीवन भर माँ गंगा से मिलन को तरसती अपनी दादी को एक ऐसी मंज़िल दे रहा था,जहाँ से शायद उसे हमारा अक्स भी बहुत धुंधला नज़र आएगा,बहुत धुँधला।
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26)मधु छाबडा ‘महक’ (एम॰ ए.)
सम्पर्क….
पता….एफ़ /बी -28, टैगोर गार्डन ,
  नई   दिल्ली 110027
              पर्यावरण ( दोहे)
तरु से जीवन आस है , तरु से ही है श्वास ।
तरु बिन जीवन है नहीं , करना ये विश्वास ।।
कर न प्रदूषित तू धरा , करती करुण पुकार ।
वसुंधरा करती सृजन , मानो ये उपकार ।।
शुद्ध हवा से ही मिले , जीवन स्वस्थ निरोग ।
होगी कलुषित जो हवा , जकड़ेंगें सब रोग ।।
जल बिन सूना जगत है , जल ही जीवन श्वास 
बूंद बूंद है कीमती , कीजे बचत प्रयास ।।
सूरज से तपती धरा , सूरज तेज अपार ।
सूरज ही से रोशनी , वही जगत आधार ।।
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27)अर्पणा संत सिंह,जमशेदपुर
मो.न.-9470359224

विध्वंसक नही संरक्षक बन 

समस्त ब्रह्माण्ड मे 
खरबों खरबों मिलों तक फैले आकाशगंगा मे
कहीं भी जीव का नमोनिशान नहीं 

न उपस्थित प्राण वायु हैं न ही जल है 

न परमाणु का वह संयोग है जिससे उत्पत्ति हो सके
 जल की अणु और उत्पन्न हो सकें कोशिका 
भिन्न भिन्न प्रजाति की कोशिकाएं 
न ही वह ताप हैं न ही वह दबाव 
न ही सूर्य से उतनी दूरी हैं न ही गुरूत्वाकर्षण बल
न ही यह उर्वरक भूमि जंगल रेगिस्तान पहाड़ समुद्र द्वीप
 ऐ अनमोल अनोखे अद्भुत
वरदान तत्वों के समन्वय से हमारी खूबसूरत पृथ्वी बनीं है
और हमारा पर्यावरण
मानव हैं इस अद्भुत सृष्टि की सर्वोच्च रचना
 बौद्धिक चेतना और प्रगतिशीलता से पूर्ण
 जो वरदान हैं वहीं अभिशापित बन गया 
पर्यावरण और धरती के लिए
 वनों की कटाई 
शहरीकरण
आधुनिकीकरण
औद्योगिकीकरण 
जनसंख्या वृद्धि 
ने असंतुलित असुरक्षित कर दिया है पर्यावरण को
 हे मानव क्षणिक सुविधा स्वार्थपरता मेंं
 न विध्वंसक बन संरक्षक बन 
सुरक्षित कर भावी भविष्य को 
वृक्षारोपण कर
जल 
वाहनों 
मशीनों 
खनिज पदार्थो 
प्लास्टिक आदि का 
उपयोग कम से कम 
सौर ऊर्जा का उपयोग
जल संग्रह और संरक्षण !
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28)गिरीश  पंकज 
सम्पर्क – सेक्टर -3, एचआईजी-2/2 , दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010
 
              दोहे
—–
पेड़ काटकर कर रहे,वे पेड़ों की बात ।
नए दौर को मिल रही,पाखंडी सौगात।।
 
 फल देते हैं छाँव भी, होते वृक्ष महान ।
लेकिन इनको काटते, मनुज नहीं शैतान । 
 
यह विकास कैसा हुआ, दिखता हमें विनाश।
पेड़ उधर घायल पड़े, इधर नदी की लाश।।
 
नई सभ्यता आ गई, शहर बन गये गाँव।
 जलकर के मरता मनुज, नहीं मिल रही छाँव।।
 
धरती, गैया, गांव नद, इन्हें बचाकर आज।
अगली पीढ़ी तब करे, हम लोगों पर नाज।
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                 गीत
अब तो जल के चलचित्र हैं…
 
नीर भरी रहती थी नदिया, लेकिन अब खुद प्यासी है। 
देख कंठ प्यासे लोगों के, मन में बड़ी उदासी है। 
हरी-भरी धरती को हमने, लूट लिया बन कर ज्ञानी। 
सूरज ने गुस्से में आकर, सोख लिया सारा पानी। 
अब तो जल के चलचित्र हैं और दुनिया आभासी है। 
देख कंठ प्यासे लोगों के,मन में बड़ी उदासी है। पेड़ बचे, नदियां बच जाएँ, गऊ का चारा-सानी भी।
तब विकास सोहेगा हमको, सुंदर हो जिनगानी भी। 
ये धरती वरदान धरा को, मत समझो यह दासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,मन में बड़ी उदासी है। अभी भी थोड़ा जल बाकी है, इसको अगर बचा लेंगे। 
आने वाले कल को हम सब, पानीदार बना लेंगे। 
वरना अब तो बंजर धरती, और गले की फाँसी है। 
देख कंठ प्यासे लोगों के, मन में बड़ी उदासी है। 
अब विकास का अर्थ हो गया, पत्थर, पत्थर औ पत्थर।
ताल-तलैया और बावली, पाट  दिए सारे बढ़ कर.
माना तुमने प्रगति बड़ी की, पर ये सत्यानाशी है। 
देख कंठ प्यासे लोगों के,मन में बड़ी उदासी है।
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लघुकथा
 एक पीड़ित माँ…..
 
उसने वर्षों तक अपने बेटों की सेवा की। किसी में कोई भेद नही किया। ..उसकी गोद में खेल कर सब बड़े हुए ।..वही मां एक दिन बेटों के अत्याचार से दुखी हो गई । माँ उपेक्षा और अत्याचार सह न सकी। उसकीे छाती सूखती गई।..वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। निरंतर बाँझ की हालत में पहुँच गई।। मां की आंखों में आंसू थे लेकिन 
कोई बच्चा उसे देखने-समझने वाला न था। एक दिन माँ गुस्से में तपने लगी। उसने शाप दिया, “जैसी करनी, वैसी भरनी।”
…और उसकी तपन से उसके बच्चे झुलस झुलस कर मरणासन्न होने लगे। उधर पृथ्वी-माँ निरन्तर रोए जा रही  थी। अब उसकी आँखों में अश्रु भी नहीं बचे थे
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29)प्रमोद भंडारी “पार्थ” 
जन्म स्थान : देवगढ़, जिला-राजसमन्द (राजस्थान)
निवास स्थान : नवी मुम्बई
जन्म दिनांक : 14 जनवरी 1978
शिक्षा : BBM, MBA, CS, ICWA
 
साहित्यिक उपलब्धियाँ
• नवी मुम्बई की प्रथम निर्माणाधीन हिन्दी फिल्म “प्यारी दुल्हन” में गीतकार की भूमिका
• प्रथम कविता नौ (9) वर्ष की आयु में प्रकाशित
• राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 1999-2000 के चन्द्रदेव शर्मा पुरस्कार से सम्मानित
• विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 80 रचनाएं प्रकाशित
• आकाशवाणी, उदयपुर से अनेक रचनाओं का प्रसारण
• प्रथम काव्य संग्रह “उजाले के अंकुर” को शब्द-प्रवाह साहित्य संस्थान, उज्जैन द्वारा राष्ट्रीय सम्मानित
माटी गाती  है ( गीत)
प्रमुदित हो कर धरती, पर्व मनाती है, 
कभी कभी सुध खोकर ,माटी गाती है।
पंछी कोई मार चोंच,उड़ जाता झट से,
स्वर लहरिया उठती तब,सूने पनघट से।
घटा लाज से दोहरी होकर मुस्काती है,
कभी कभी सुध खोकर माटी गाती है।
अम्बर का आँचल अटके जब वट के गहरे झुरमुट में,
 बेचैनी सी हो जाती है खग वृंदों के गुट में।
कलरव में हौले से सन्ध्या नीड़ बनाती है,
कभी कभी सुध खोकर माटी गाती है।
विरह वेदना कोयल की जब रास नहीं आए,
दिन रात कूकते उपवन में नीरवता छाए।
मन वृंदावन की बाती कोरे दीप जलाती है,
कभी कभी सुध खोकर माटी गाती है।
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30) डॉ.पूर्णिमा राय,
शिक्षिका एवं लेखिका,
अमृतसर,(पंजाब)
                   दोहे

पेड़ों से छाया मिले,मन को मिले सुकून।
हितकारी सब पेड़ हैं,करना तुम मत खून।।

पेड़ अगर होते नहीं,होता जीवन नष्ट।
मानव मरते भूख से,सहते पशु भी कष्ट।।

खाते सब जन चाव से,मीठे लगते आम।
देखभाल करते रहें,बस ये ही है दाम।।

बूढ़ा पीपल कह रहा,सुन लो मेरी बात।
ईश समझकर पूजना,तुम सब अपना तात।।

तेज़ थपेडों को सहा, झूम रही भू आज।
उग आई फिर घास है,करे न बिल्कुल नाज।

लहराती फसलें दिखें,मिल जाएगाअन्न।
हरियाली आगोश में,होता कृषक प्रसन्न।।**************************************

            मनहरण घनाक्षरी

1)

काला-काला धुआँ देखो, फैल रहा चहुँ ओर

आक्सीजन चाहिए तो , पेड़ों को लगाइये

वाट्स एप फेसबुक, दिल के करीब हुए;
रिश्तों में आए दूरी,उसको मिटाइये।।

नित बढ़ती कार्बन ,दिलों पे है जम रही;
स्वच्छता के आईने में,खुद को निहारिए।।

नाचे देखो प्रदूषण, रोज ही चौराहों पर;
आँख, कान, नाक खोल,देश को सजाइये

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2)

भीड़ का माहौल और दुख से भरा जीवन

सूखा दिखे चारों ओर ,कृषक उदास है।

दूषित है वातावरण ,मार-काट बढ़ रही

धन की उड़े पतंग,मिटती न प्यास है।।

अवनति का जंजाल, नशे में मनुज चूर

टूट चुकी रीढ हड्डी,ढँढे अब आस है।

विषय वासनाओं का,बना हुआ अनुचर

टोप पहना अहं का,नहीं कोई पास है।।

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भूमि का शृंगार तरु है!!!(मुक्तक रचना)

बरसों से एक निगाह
थोड़ी सी लापरवाह!
ढूँढ रही  थी हमेशा
शीतल छाँव का गवाह!!

कड़ी धूप का था साया
चाहे वे तरुवर छाया!
चलते ही पगडंडी पर
स्मरण उसे था यह आया!!

ओ नन्हें ! मेरी बात ले मान
ना कर कभी तू इतना गुमान!
सूखे पेड़ को दे जा  पानी
वर्ना नहीं बचे जिंदगानी!!

आज वह बूढ़ा हो गया था
यौवन नशे में खो गया था!
प्रकृति से मुँह फेरके वह तो
कंकर राह में बो गया था!!

सुप्त चेतना ने उसे जगाया
बूढ़े ने फिर जग को बताया!
पेड़ धरा की असली धरोहर
तरुवर ने ही विश्व सजाया!!

पौधों को हम पानी दें
बचपन और जवानी दें!!
भूमि का शृंगार तरु है;
मिलकर नयी रवानी दें।

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संपादित एवं संकलित

डॉ.पूर्णिमा राय,शिक्षिका एवं लेखिका ,अमृतसर,पंजाब  Business sandesh (Managing Editor) 7087775713

drpurnima01.dpr@gmail.com

(विशेषांक संबंधी  सुझावों  का सदैव स्वागत  )

 
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6 COMMENTS

  1. अच्छी कोशिश। रचनाओं को देख रहा हूँ।

  2. वाह,क्या बात है।पूर्णिमा जी हार्दिक बधाई।बूढ़ा पीपल कह रहा,सुन लो मेरी बात।ईश समझ कर पूजना,तुम सब अपना तात।।डा.भावना तिवारी की कविता व सभी आलेख उत्कृष्ट हैं।

  3. पर्यावरण जैसे वैश्विक मुद्दे पर सुधी चिंतन मणियों को एकत्र कर आपने जो संदेश देश भर को देने का पवित्र उपक्रम आपने किया है इसके लिए कायल हुन आपका।सभी रचनाएँ बेहतरीन हैं।
    साधुवाद,नमन आपको और आपके सद्प्रयासों को।

  4. विश्पव र्यावरण दिवस पर गुलदस्ते सा पठनीय विशेषांक । सभी रचनाकारों की रचनाएँ, दोहे ,लघुकथा सुन्दर , उत्तम । बधाई सभी को व पूर्णिमा जी को ।

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