अनुभूति

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 अनुभूति( सत्या शर्मा कीर्ति)

” माँ कल मेरे स्कूल में लेख प्रतियोगिता है, क्या आप मेरी मदद कर देंगी ” – 14 वर्षीय अंकुर ने स्कूल से आ कर माँ से कहा ।
” हाँ क्यों नहीं बेटा किस विषय पर लिखना है ” – माँ ने प्यार से पूछा ।
” प्रेम ” पर — कहा अंकुर ने
अरे ! इतना सुंदर विषय है तुम स्वयं लिखने की कोशिश क्यों नहीं करते ?
पर माँ, मैं तो किसी से भी अभी तक प्रेम नहीं किया — मायूस हो कर अंकुर ने कहा।
” लो भला इतना तो प्यार करते हो मुझसे, पापा से , परिवार से, आस- पड़ोस यहाँ तक कि पेड़ – पौधों लिए भी तुम्हारी जान जाती है ” –कहा माँ ने
पर ! माँ लोग तो कहते हैं जब स्त्री पुरुष एक – दूसरे को पसन्द करते हैं और एक दूसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं उसे प्रेम कहते हैं — पूछा अंकुर ने।
हाँ , उसे भी कहते हैं पर बेटा प्रेम इसके अलावा भी एक शाश्वत एहसास है जो किसी से भी किया जा सकता है ।
जैसे – किसी का ईश्वर से , माता – पिता का अपने बच्चों से ,कोई पुस्तकों से प्रेम करता है , तो कोई देश है तुम्हें याद है चंद्रशेखर, भगत सिंह , लक्ष्मी बाई की कहानियाँ क्या इनके देशप्रेम को भुलाया जा सकता है ? समझाया माँ ने ।
“हाँ माँ आप सही कह रही हैं तो मैं क्या लिखूँ ” — पूछा अंकुर ने ।
लिखो प्रेम सिर्फ दैहिक आकर्षण नहीं वरन एक अनुभूति है ,एक एहसास है । जब किसी व्यक्ति या प्रकृति के किसी भी अंश को देख कर मन में स्नेह , ममता , अपनापन, आकर्षण और भावात्मक लगाव महसूस हो ,जहाँ मैं – तुम खत्म हो कर सिर्फ हम रह जाए , वही प्रेम है ।
“जैसे मेरा प्यारा बेटा मुझसे अगाध प्रेम करता है — ” कह माँ ने लाड़ से बेटे को गले से लगा लिया और अंकुर माँ के सान्निध्य में पवित्र प्रेम की अनुभूति से भर उठा ।

सत्या शर्मा ” कीर्ति “
राँची , झारखण्ड
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1 COMMENT

  1. मेरी लघुकथा को स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार पूर्णिमा जी

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