हिंद का लाल : करतार सिंह सराभा (24मई विशेष)

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” शहीद करतार सिंह सराभा ” विशेष रचनाएं

जन्म–24 मई 1896
मृत्यु—16नवंबर1915

 हिंद के लाल(आल्हा छंद)डॉ.पूर्णिमा राय

वीर भगत सिंह ,उधम, शेखर ,औ सराभा हिंद के लाल।
उनके जैसा जिगरा रखकर, करें देश का ऊँचा भाल।।
कर्म करें निष्काम भाव से ,हिम्मत रखते हर पल वीर 
मौत का ताँडव खेल अनोखा,झुकता उनके आगे काल।
देश-प्रेम हित जीवन बीता,कर दी जानें भी कुर्बान।
खून की बूँदें रंग लायेंंगी,रहा न हृदय कोई मलाल।।
लुधियाना का गाँव सराभा,जगमग करता है करतार।
चिंगारी बन जाती ज्वाला,दमित अमेरिका के सवाल।।
साढे उन्नीस अल्पायु में,त्यागी उसने सुंदर देह।
गदर पार्टी का लोक नायक,देश रंग में रंगा लाल।।
जात-धर्म ईमान हिन्द है,भारत की सेवा अरमान।
देश कौम की खातिर जीना,मरना उनका अंतिम ख्याल।
…डॉ.पूर्णिमा राय,शिक्षिका एवं लेखिका
अमृतसर(पंजाब)
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 शहीद और शहादत (राहुल द्विवेदी स्मित)
 
थूक रहा हूँ देश जाति की, दूषित हुई सियासत पर 
थूक रहा हूँ घर में पलती, इस जहरीली आफत पर 
 इस भारत में खूनी कुत्तों, को जब मारा जाता है 
तब गिद्धों की नस्लों वाला, कुनबा भी थर्राता है 
न गिद्धों को भारत भू के, सपनों का कुछ भान नहीं 
और शहादत शांति सुरक्षा, का बिलकुल भी ज्ञान नहीं
 इनको तो कुत्तों की लाशों, पर चिल्लाना आता है
राजनीति की खातिर हद से, तक गिर जाना आता है 

लानत देता हूँ मैं ऐसे, घर में छुपे सियारों को

लानत देता हूँ आतंकी, नस्लों के मक्कारों को

लानत है जिनको वीरों की, नहीं शहादत दिखती है

जिनको केवल आतंकी की, खस्ता हालत दिखती है 

थूक रहा हूँ उन लोगों पर, जो भारत को छलते हैं ।

और सहादत तक पर कायर, रोज सियासत करते हैं 

थूक रहा हूँ उन पर जिनको, संविधान का ज्ञान नहीं ।

जिनके मन में भारत माँ का, मान नहीं सम्मान नहीं 

जिनका दिल इस भारत माँ का, मान नही रख सकता है 
जिनका मन सच्चे वीरों का, ध्यान नहीं रख सकता है 
जो वीरों के कटे सरों पर, मौन नहीं तज पाते हैं ।
और दुश्मनों की लाशों पर, आँसू खूब बहाते हैं ।
ऐसे सत्ता पर बैठे कुछ, दुश्मन अब तक जिन्दा हैं ।
वीर जवानों की रूहें इस, हालत पर शर्मिंदा हैं ।
 जिनकी खातिर मिटे वहीं दुश्मन की भाषा रटते हैं ।
कैसे खुद को भारतवासी, निर्लज्जी कह सकते हैं 
 आज देश के सच्चे वीरों, की भाषा में कहता हूँ ।
और देश के पहरेदारों से उम्मीदें करता हूँ ।
 जो सेना पर प्रश्न उठाये, उसको हक क्या जीने का ।
जिनको मतलब समझ न आता, छप्पन इंची सीने का 
देश द्रोह जब संविधान में, सजापात्र कहलाता है ।
फिर कैसे सत्ता पर बैठा, हर कपटी बच जाता है ।
 पहले आगे आकर हमको, देशद्रोह समझाओ तो ।
लिखित रूप से देशद्रोह की, परिभाषा बतलाओ तो 
 जिससे भारत में फिर कोई, देशभक्ति बदनाम न हो
घर में रहने वालों से फिर, देशद्रोह का काम न हो ।
 सरहद पर मिटने वालों को, खुद पर होता नाज रहे ।
स्वाभिमान से और फक्र से, जिन्दा हर जाँबाज रहे ।
 बहुत हुआ आतंकवाद का, महिमामण्डन बन्द करो
न्याय और सेना का ऐसे, करना खण्डन बन्द करो ।
 यदि कोई आतंकवाद की, बात करे तो फाँसी दो ।
भारत की सुचिता से कोई, घात करे तो फाँसी दो ।
नेता हो या आम नागरिक, हर मुजरिम को फाँसी दो 

देशद्रोह सी बात करे जो, उस हाकिम को फाँसी दो ।

आतंकी का धर्म न पूछो, सीधे गोली मारो तुम

फिर जो प्रश्न करे उसको भी, सरेआम ललकारो

तुम जेल भरो सत्ता पर बैठे, आतंकी आकाओं से ।

जिससे कोई खेल न पाए, फिर शहीद के घावों से ।

अगर शहादत सस्ती लगती, अपने भी बच्चे भेजे।

सरहद पर अपने घर वाले, देशभक्त सच्चे भेजे

सच कहता हूँ हर शहीद का, मोल समझ तब आएगा

अंगेजों का भीख दिया वह, शीश तभी कट पायेगा ।

 राहुल द्विवेदी ‘स्मित ,ग्राम-करौंदी, पोस्ट-इटौंजा

लखनऊ, उत्तर प्रदेश,226203

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 सुमन से अर्ज (दीपिका कुमारी)

 

मेरी अर्ज  सुन  ले  ऐ सुमन।

तू भी जन्मों का कर्ज चुका दे,

कर आज उन को अर्पण। 
 उन शहीदों के चरणों में
आज श्रद्धांजलि रखनी है।
अपनी अश्रु  की दो  बूँदें
उन्हें समर्पित करनी है।।
वे वीर देश के खातिर
कहलाये बलिदानी।
उन महान शहीदों की
बस यही अमिट कहानी।।
उन वीरों के खातिर तू भी
बदल अपनी जिंदगानी।
उनके चरणों में जाकर
दे  दे  अपनी  कुर्बानी।।
कट गया सर उनका
पर मुख मुस्कुराता रहा।
गाड़ दिया तिरंगा तो
आँधी में भी लहराता रहा।।
ऐ पुष्प, तू खुशनशीब है
जो तुम्हें ये नाम मिला है।
उन महापुरुषों के कदमों में
जाने का वरदान मिला है।।
देश के लिए जिन्होंने अपने
खून  से  खेली   होली।
घायल होने पर भी उठकर
झेली   जिन्होंने गोली ।।
ऐसे वीरों के कदमों में
तुम अपना शीश झुकाना।
उनकी याद में ही सदा,
अपनी पँखुड़ी को सजाना।।
इस संसार से चले गये वे
अपने बिलखते बच्चे छोड़कर।
माँ का आँचल सूना कर
पत्नी से अपना वादा तोड़कर।।
फूल बनकर ही जाना
मत अंगारे बन जाना।
मधुर सुगंध की कलियाँ भी
उनके चरणों में बिखराना।।
उन वीरों की वीरता पर ही
देश करता है अभिमान।
भगवान से पहले कहते हैं
जय जवान जय हिंदुस्तान।।
भारत के अनमोल रत्न थे
मत कहना वे वीर थे कौन।
उनकी शांति की दुआ करना
कुछ देर वहाँ तुम रहना मौन।।
मेरी ये अर्ज पूरी करोगे
मुझको है यह आशा।
सुना है तेरी भी तो
यही है अभिलाषा ।।
– दीपिका कुमारी दीप्ति(पटना)
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कोटि कोटि प्रणाम (डॉ.हरिभजन प्रियदर्शी)

 

कोटि कोटि प्रणाम हूँ करता
 मैं वीर शहीदों को,

देश की खातिर कुर्बानी दी

 उन अमर सपूतों को।।

राष्ट्र के खातिर वीर ने ,
अपना सर्वस्व लुटाया है
भारत माता के लिये ,
अपना खून बहाया है।
वीर शहीद कभी न मरते हैं,
 सदा अमर वे रहते हैं।
देशवासियों की धड़कन में,
 सदा वे ही बसते हैं।
जब पर्वत जैसे तन जाते हैं,
 दुश्मन भी पीछे हट जाते हैं।
गर्जन जब वे करते हैं ,
दुश्मन के पसीने छूटते हैं।
पर
वीर शहीद मात्र चार दिन,
 ही क्यों याद आते हैं।
जन्म ,शहीदी ,पन्द्रह अगस्त,
 यां स्वतंत्र दिवस मनाते हैं।
देशवासियो आपसे ,
मेरी यही है याचना।
इनके पद्चिह्नों को ,
हम सबको है अपनाना।
भारत के जन मन पर ,
इनकी गाथा लाना है।
शहीदों के मार्ग पर ,
हमको चलते जाना है।।
 …डॉ.हरिभजन प्रियदर्शी,मुक्तसर
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संकलित एवं संपादित

 डॉ पूर्णिमा राय
 शिक्षिका एवं लेखिका
 अमृतसर,पंजाब

 
 


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