काव्य पुष्प जवानों के नामby राहुल द्विवेदी स्मित

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राहुल द्विवेदी "स्मित"

निकल चुका है तीर धनुष से, दुश्मन की बर्बादी का ।
गुर्राया है शेर देश की, सौ करोड़ आबादी का ।

आतंकी अड्डों की सारी, बुनियादें थर्रायी हैं ।
दहशत के घर को दहलाने, हिंदी तोपें आयी हैं ।

कट्टरपंथी काँप रहे हैं, सुधबुध खोकर बैठे हैं ।
घर के दुश्मन खिसियाये हैं, दामन धोकर बैठे हैं ।

कुछ बंकर ही नष्ट हुए हैं, आगे की तैयारी है ।
अम्न चैन के दुश्मन ! तेरी बर्बादी की बारी है ।

बहुत हुआ अब नहीं सुनेंगे, गीदड़भभकी कानों से ।
अबकी बार पड़ा है तेरा, पाला हम तूफानों से ।

तूने सर काटे तो काटे, हम बर्बादी लाएंगे ।
जहां अमन के फूल खिलेंगे, ऐसी वादी लाएंगे ।

प्रलय बिना नवनिर्माणों की, नींव नहीं पड़ सकती है 
निष्कर्षों के बिना युध्द सेना कब तक लड़ सकती है 

यदि अभियान उठाया है तो, विजय पुष्प खिलना होगा
दुश्मन को निश्चय ही कल तक, मिट्टी में मिलना होगा 

नही चलेगा अब भारत में, कायरता का अफसाना ।
नहीं चलेगा थप्पड़ खाकर, बस गालों को सहलाना ।

दुश्मन की गोली के बदले, तोपों से हमले होंगे ।
दिव्य अस्त्र भारत भू के गलियारों से निकले होंगे ।

हम झेलम को फिर उसका इतिहास अमिट दिखलायेंगे
हम दुश्मन को इस दुनिया का, अब इतिहास बनाएंगे 

श्वेत कबूतर अब सरहद पर, नहीं काटने देंगे हम ।
धर्म जाति में इस भारत को, नहीं बाटने देंगे हम ।

पत्थर का बदला पत्थर से, गोली का बारूदों से ।
और फलों का बदला देंगे, हम मीठे अमरूदों से ।

हमने दुनिया की सारी भाषाओं को अपनाया है ।
और विश्व गुरु बनकर जग को, सदा मार्ग दिखलाया है

अंग्रेजो को अंग्रेजी में, उनका मर्म बताया है ।
और चीन को भी उनकी ही, चीनी में समझाया है ।

प्रथम बार सत्ता ने सेना, को ताकत दे रक्खी है ।
दुश्मन से टकराने वाली हर हिम्मत दे रक्खी है ।

ऐसे में यदि हमने भी सेना का साथ नहीं छोड़ा ।
एक अटूट भरोसे वाला उसका हाथ नही छोड़ा ।

तो दुश्मन की बर्बादी को, कोई रोक नहीं सकता ।
कालचक्र के इस निर्णय को, कोई टोक नहीं सकता ।

विष्णु सुदर्शन, शिव त्रिशूल ले, स्वयं पुष्प बरसायेंगे ।
अब सीमा पर शांति सुरक्षा, के मौसम भी आयेंगे ।

मैं शब्दों के पुष्प भावना, के दीपक ले आता हूँ ।
मैं भारत की सेनाओं को, शत-शत शीश झुकाता हूँ ।

राहुल द्विवेदी ‘स्मित’,लखनऊ
8299494619

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