नर्म एहसास :एक अवलोकन

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पदमा शर्मा रचित काव्य संग्रह “नर्म एहसास”:एक अवलोकन by नीरजा मेहता

कवयित्री पदमा शर्मा ‘आँचल’ द्वारा रचित, उत्कर्ष प्रकाशन द्वारा प्रकाशित व माता-पिता को समर्पित 96 पृष्ठों के इस काव्य संग्रह, “नर्म एहसास” में 79 कविताएँ हैं जिसमें कवयित्री ने अपने मन के एहसासों को बहुत ही नर्मी से पिरोया है।

उन्होंने अपनी ज़िंदगी को एक सौगात के रूप में देखा है। उनको पद्मावतीपुरी धाम का आशीर्वाद मान “पदमा” नाम दिया गया जहाँ उनको एक नया जीवन मिला था।

*कवयित्री के भाव*
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संवेदनशील कवयित्री के रूप में विख्यात पदमा शर्मा ‘आँचल’ ने अपनी इस पुस्तक में समाज के हर पहलू को समेटा है। इनके काव्य में जहाँ एक ओर कहीं दर्द है, कहीं ममता है, कहीं संघर्ष है, कहीं सफलता है तो दूसरी ओर समाज को एक संदेश भी है जिसको अनुपम शब्दों में कविता के रूप में सजाया है। कुछ कविताओं के भाव आपके समक्ष रख रही हूँ——–

“पदमा शर्मा” (पृष्ठ 24)
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पदमा जी ने स्वयम को बेहतरीन शब्दों में व्यक्त किया है। पृष्ठ 24 की इन पंक्तियों को पढ़कर पाठक उनके एहसासों से स्वयं रूबरू हो जाएंगे। अपने नाम को बखूबी अभिव्यक्त किया है—
“प—पलकों से मेरे बह गए
भीगी-भीगी सी यादें
फिर क्यों शमा जलाए बैठी हूँ।”
(यदि इनके नाम के हर वर्ण को समझना चाहते हैं तो खरीदिये और पढ़िए ‘नर्म एहसास’)

“दुनिया एक मेला” (पृष्ठ 13)
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इस कविता में कवयित्री लिखती हैं—
“उनके नर्म एहसासों में
पाओगे तुम मुझे भी
इंतज़ार करना मेरा
मैं लौट आऊँगी
इसी राह पर
इसी मेले में”…..
बेहद खूबसूरत एहसासों में सिमटी रचना। ये दुनिया एक मेला ही तो है जहाँ घूम कर मानव फिर उसी जगह पहुँचता है।

“कहाँ हो तुम” (पृष्ठ 17)
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इस कविता में कवयित्री ने पक्षियों व प्रकृति का सहारा लेकर मानव मन से जोड़, भावों को कुछ यूँ उकेरा—
“कभी-कभी यूँ लगता है
जैसे वक़्त की आँधी को रोक लूँ
हवा का रुख बदल दूँ।”

“कुछ पाती भेजी थी मैंने
चंचल चपल पंछियों को
चाहत की उड़ान लेकर
आये थे वे पक्षी
तुमको मिले नही
कहाँ हो तुम…?”

“क्षितिज के उस पर
चाँद की बारिश ढूँढती है तुम्हें
अमावस्या की काली रात में
कहाँ छुप गए हो तुम।”

वाह बहुत ही बेहतरीन पंक्तियाँ।

“डूब जाती हूँ मैं” (पृष्ठ 20)
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इस कविता में शब्दों का बेहतरीन सामंजस्य बैठाया है। टप टप टप गिरती बारिश की बून्दों को अपनी कसक और तड़प से जोड़ा है। आंतरिक पीड़ा को दर्शाती रचना युग्म शब्दों से बहुत सुंदर बन गयी है।
“टप टप टप
हल्की हल्की बून्दें”

“चाँदनी रोती है तड़प-तड़प कर
बिलख-बिलख कर”

“कैसी कसक है
कैसी तड़प है
कैसी आह है
और मैं डूब जाती हूँ
इसी आह में”

कितना दर्द छुपा है इन पंक्तियों में।

“यादों की छतरी” ( पृष्ठ 28)
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मौसम को इंगित कर एक भाव भीनी रचना ने मन मोह लिया। वो लिखती हैं–
“मौसम का मिजाज बदला
मोहब्बत की बारिश शुरू हो गयी।”
वाह बहुत खूब, मिजाज मौसम का और बारिश मोहब्बत की, क्या एहसास हैं।

“अधूरा स्पर्श” (पृष्ठ 41)
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इस कविता में दूरी के एहसास को मन के स्पर्श से करीब बना कर बहुत सुंदर भाव पिरोए हैं—
“दूर से आवाज़ दी है किसने
हल्के स्पर्श से जगाया है किसने”
दूर से ही उनको स्पर्श का एहसास हुआ है। वाह, बहुत सुंदर भाव।

“गुलाब” (पृष्ठ 47)
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इस कविता में स्वयम को गुलाब सी कोमल न बताकर बल्कि सच्चाई से महकती खुशबू बताया है जो समुंदर की तरह शांत है पर हक़ीक़त को अपनाती है। वो कहती हैं—
“मैं कोई चंचल नदी नहीं,
शांत समुंदर हूँ।
कोमल गुलाब न समझना
मैं सख्त कठोर पत्थर हूँ।”

“तवायफ़” (पृष्ठ 52)
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बेहद भावपूर्ण सृजन है। एक तवायफ़ की मानसिक दशा का वर्णन है। तवायफ़ की बेटी होकर उसको अपनी दुःखी ज़िन्दगी का एहसास है इसीलिए वो बेटी को जन्म देना नहीं चाहती और परिवार नियोजन कैम्प की ओर बढ़ जाती है। कवयित्री लिखती हैं—
” एक कुँवारी अनछुई कली
डॉक्टर से निवेदन करने लगी
मेरा आपरेशन करा दीजिये
मैं कोई तवायफ़ पैदा करना नहीं चाहती।”
सुंदर संदेश के साथ बुराई को खत्म करने की चाह भी दर्शायी गयी है।

“कभी यूँ भी तो हो” (पृष्ठ 62)
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कवयित्री के शब्द कुछ यूँ—
“कभी यूँ भी तो हो
रूठकर बैठ जाऊँ कभी
खुद से दूर हो जाऊँ कभी
अकेलापन जब सताने लगे
बनकर मेहमान तू आये”
सुंदर कोमल एहसास भरी पंक्तियाँ, प्रिय को अतिथि रूप में भी पाने की चाहत।अति सुंदर सृजन।

भूख” (पृष्ठ 66)
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बहुत ही मार्मिक रचना है। भूख को अलग-अलग अंदाज में लिखा है—
“किस भूख के बारे में लिखूँ
भूख की रचना लिखूँ ?
या भूखे की आलोचना लिखूँ ?”
अंतिम पंक्ति में कविता का सार सिमट गया है।

“मुस्कान” (पृष्ठ 74)
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बहुत ही खूबसूरती से मुस्कान को तीन रूपों में सजाया है, दर्द को मुस्कान से मिटाया है। संदेश के साथ जीवन भी दिया है।
“अपनी तो हर मर्ज की दवा है
बस तेरी एक मुस्कान”।

“खेल-खेल में” (पृष्ठ 77)
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इस कविता में राजा मंत्री चोर सिपाही वाले बचपन के खेल को जीवन से जोड़ा है। वो लिखती हैं–
“इसी खेल-खेल में
न जाने किस चोर ने
चुराया उसका बचपन
चुराई उसकी खुशियाँ
परिस्थितियों ने बनकर सिपाही जकड़ रखा है उसे…….”

“संगीत” (पृष्ठ 84)
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कवयित्री एक बेहतरीन गायिका भी हैं तो इनके काव्य में संगीत न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शब्दों का प्रयोग देखिए—-
“कल कल कल कल
नदियों में संगीत”

“सर सर सर सर
सुरमय संगीत”

“टप टप टप टप
बजता संगीत”
कवयित्री को हर भाव में संगीत सुनाई देता है।

“दामन” (पृष्ठ 86)
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माँ की याद में लिखी रचना बहुत ही भावपूर्ण है। कवयित्री कहती हैं—-
“माँ तेरा दामन
चाँद की शीतलता जैसी
तेरा प्यार मेरी माँ
जाड़े में गुनगुनी धूप जैसी।”

“दस्तूर” (पृष्ठ 92)
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कवयित्री ने आध्यात्मिकता को भी अपने काव्य में स्थान दिया है। वो लिखती हैं–
“हर आत्मा में परमात्मा है
फिर एक परमात्मा
दूसरे परमात्मा को खाता क्यों है।”
सच है ये जब हर आत्मा में परमात्मा बसता है तो ये दरिंदगी क्यों ? एक अच्छा प्रश्न उठाया है कवयित्री ने।

अगर लौटा सको तो” (पृष्ठ 96)
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इस कविता ने वर्तमान पीढ़ी पर अच्छा व्यंग्य कसा है। खत के इंतज़ार में जो बेकरारी थी वो आजकल मोबाइल के रहते खत्म हो गयी है। वो कहती हैं—
“दूर से आते हुए उस
डाकिए को देखकर
वो मेरा खुश हो जाना…..”
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” रचनाओं में भाव-पक्ष”
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कवयित्री की रचनाओं में भाव पक्ष बहुत ही दृढ़ता से पाठक के समक्ष उभर कर आया है। उन्होंने मानव मन के बिखरते संवरते रूप को विभिन्न उपमाओं से काल्पनिकता व यथार्थ के आंगन में मार्मिकता से उतारकर अनुपम शब्दों में ढालने का अच्छा प्रयास किया है। उनकी सार्थक, सटीक व प्रेरक अभिव्यक्तियों ने कहीं मेरे मन को गहरा छुआ है तभी मैं कुछ लिखने को विवश हुई। आशा है पाठक उनकी पुस्तक को अवश्य पढ़ेंगे और आनंद लेंगे।
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“रचनाओं में कलात्मकता”
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पदमा जी की लेखनी में जहाँ सरलता है वहीं दूसरी ओर गंभीरता भी है जिसमें आत्मानुभव का दर्शन होता है।
उनकी भाषा सरल व ग्राह्यपूर्ण है जो सरलता से समझी जा सकती है। उनकी रचनाएं प्रवाहमय हैं जो पाठकों को बांध कर रखती हैं। करुण, श्रृंगार, शांत, क्रोध आदि रसों के प्रयोग ने कवित्व को जीवंत कर दिया है। कहीं कहीं दार्शनिकता के भी दर्शन हुए हैं। कही-कहीं शब्द युग्म के प्रयोग ने उनकी रचना को निखारा है तो कहीं प्रश्नात्मक शैली अपनाई है। अंततः यही कहूँगी कि “नर्म एहसास” पुस्तक पठनीय है।
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“शुभकामनाएं”
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मैं कवयित्री पदमा शर्मा ‘आँचल’ को उनके इस अनमोल काव्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई व अनंत शुभकामनाएं देती हूँ। हिन्दी साहित्य को इस अनमोल देन के लिए उनकी आभारी हूँ। निश्चय ही पाठक इसको पढ़कर आनन्दित व लाभान्वित होंगे।

शुभकामनाओं सहित

नीरजा मेहता ‘कमलिनी’

वर्तमान निवास : बी-201, सिक्का क्लासिक होम्स,
कौशाम्बी, गाज़ियाबाद (यू. पी.)

मोबाईल/ईमेल—- 9654258770
mehta.neerja24@gmail.com

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